Tuesday, March 24, 2009

डर के आगे जीत है....

नमस्कार दोस्तों। बहुत दिनों से ख्‍वाहिश थी कि आपसे कुछ बाटूँ। हाँ, अपना डर....। हमारी पढाई ख़त्म होने को है, नौकरी नहीं मिल रही...आगे क्या करेंगे....ऐसे कई सवाल हर पल हमें घेरे रहते हैं। ऐसे में कई बार एक तरह का डर घर कर जाता है। हाल में पढ़े एक नॉवेल ने मुझे इस सिलसिले में बहुत आकर्षित किया। इसके कुछ अंश आप लोगों के साथ शेयर कर रही हूँ.....

यह अंश 'लाइफ ऑफ़ पाई' से है। कई मायनों मैं ये एक भयावह किताब है लेकिन यह अजीब है कि जिंदगी के सबसे भयावह रूप देखने के बाद अंतत: आपका विश्वास जिंदगी की अच्छाई पर ही आकर जमता है। नोवल का यह अंश मुझे ख़ास पसंद है, क्यूंकि ये डर के अँधेरे को शब्दों की रौशनी से जीतने की बात करता है।
" डर के बारे मैं एक बात कहूँगा। यह जिन्दगी का एकलौता सच्चा दुश्मन है। डर के हारे हार है। यह चालाक, धोखेबाज दुश्मन है, यह मुझसे बेहतर कौन जानेगा। इसमें न शालीनता है, न नियमों और रीति-रिवाजों के प्रति आस्था, यह जरा भी दया नही दिखाता। यह सबसे बड़ी कमजोरी पर हमला बोलता है, जिससे वह आसानी से पहचान लेता है। यह खेल हमेशा दिमाग से ही शुरू होता है । जब आप शान्ति, आत्मविश्वास से भरे और खुश होते हैं, तभी डर शक का जामा पहने चुपचाप एक जासूस की तरह मन मैं घुस आता है । शक की लड़ाई होती है विश्वास से। विश्वास शक को भगाना चाहता है। मगर विश्वास के हथियार कमजोर हैं, वह मात्र एक प्यादा है। डर बड़ी आसानी से उसे हरा देता है। आप परेशान हो जाते हैं। बुद्धि और तर्क आपका साथ देते है। हिम्मत बढ़ती है। बुद्धि के पास तो नए से नए तकनीक के हथियार हैं। पर आश्चर्य , उत्तम चालों और पहले से अनेक जीतों के बावजूद तर्क-बुद्धि हार जाती है। आप कमजोर हो जाते हैं, लड़खड़ाने लगते हैं। बेचेनी और बढ़ जाती है...शब्दों की रौशनी...अब डर आपके शरीर पर हमला बोल देता है, शरीर को पहले से ही आभास है की कुछ गड़बड़ चल रही है। फूलती साँस उड़ती चिडिया की तरह साथ छोड़ने लगती हैं और आंतें साँप की तरह सरकने लगती हैं। जबान सूखी व बेजान हो जाती है, जबड़े हिलते हैं, दांत बजने लगते हैं। कान बहरे हो जाते हैं। अंग-अंग अपने तौर पर बिखर जाता है। बस आँखें खुली रहती हैं। डर पर उनका पूरा धयान रहता है। हड़बड़ी में जल्दबाजी भरे फैसले लेते हैं...बस, आपने ख़ुद अपने को हरा दिया। डर जो सिर्फ़ आपका एक वहम है, जीत जाता है।

इसे शब्दों में कहना मुश्किल काम है।....डर जो याददास्त में गंग्रीन की तरह समा जाता है, सब कुछ सड़ा डालता है, यहाँ तक की शब्द भी। इसे बताने के लिए बहुत कोशिश करनी होगी। उसका सामना करना होगा, ताकि शब्दों से वह रौशन हो जाए। अगर आप ऐसा नही करेंगे, अगर आपका डर ऐसा शब्दहीन अँधेरा बन गया जिससे आप बचते हैं, शायद भुला भी देते हैं, तो आप डर के भावी हमलों के लिए सहज उपलब्ध होते हैं, क्योंकि हकीकत में आपने तो विजेता दुश्मन का मुकाबला किया ही नही......"
हम सब के अन्दर कोई न कोई डर होता है। जब तक हम उसे बाहर नही करते हम उससे हारे ही रहेंगे...
प्रतिक्रिया के इंतज़ार में....

2 comments:

  1. आपका मात्राओं का प्रयोग से सही तरीके से डर को उभार पाने में कामयाब नहीं हो पाया. वैसे हकीकत जानते हुए भी अक्सर हैरानी होती है कि हम सब नौकर बनने को कितने उतावले हैं!
    हकीकत ये कि सब नौकर बनने की ट्रेनिंग लेने(नौकरी) ही यहाँ आये थे. ये बात और है कि कोई इरादतन आया और कोई इत्तेफाक से.
    जिंदगी में इन चीजों से डरना छोडो यार. सौम्य का केस सौल्व हो गया है, अगर यही हकीकत है तो ये बात ज्यादा डरावनी है.

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  2. ye to dar par ek essay hi likh dala aapne. achhi philosophy hai.keep it up .tum achhe nibandh likh sakte ho.par science kahta hai ki har cheez ke peechhe koi karan hota hai ayr aage nivaran.jise shabdon ka jadoo nahi jan sakta .dar ek psychological state hai jo hamare andar ki asuraksha ko batati hai.jinki roji roti khatre mein hai unhe dar to hoga hi .par haan eske saath hi karan nivaran aur us se nibatne ke prayaas bhi shuru ho jate hain .

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