Wednesday, March 18, 2009




हमारे देश को आज़ादी दिलाने में स्वतंत्राता आंदोलन की विशेष भूमिका रही।अंग्रेजो के विरूद्ध चले आंदोलन ने 100 साल के शासन को उखाड़ कर फेक दिया।1947 के बाद की स्थिति ने सारे सपनों को तोड़ दिया।स्वतंत्राता के बाद भी कई आंदोलन उठे जिन्होंने भारतीय व्यवस्था को सुधारने का प्रयास किया।1947 के लिए भारत में भाषा जाति क्षेत्राीय सीमाओं से बाहर आकर आंदोलन की प्रक्रिया चली। लेकिन इसके बाद समाज भाषा जाति क्षेत्राीय सीमाओं में ही विभाजित हो गया। आज़ादी के बाद राज्यों के पुनर्गठन की मांग चली।दक्षिण में मलयालम तमिल और उत्तर में हरियाणा पंजाबी भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग चली।इसके माध्यम से वह आर्थिक व्यवस्था में सुधार और सामाजिक अव्यवस्था को खत्म करना चाहते थे।1960 के दशक में व्यवस्था बिगड़ने लगी।राज्यों में अशंाति उत्पन्न होने लगी।सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था को सुधारने के लिए सरकार द्वारा कई कार्यक्रम किए गए लेकिन इनका परिणाम नकारात्मक ही रहा।देश में गरीबी भ्रष्टाचार बढ़ता ही जा रहा था।1960 में कांग्रेस में पूंजीपतियों के वर्चस्व के कारण समाज में गहरा असंतोष उत्पन्न हो रहा था।1960 में नक्सल आंदोलन जंगलो की कटाई तक सीमित था।70 तक मध्य वर्गीय बुद्विजीवियों और गरीब दलित और आदिवासियों को प्रभावित करने लगा। सरकार का एक तानाशाही रूप 1975 के आपातकाल में स्पष्ट दिखाई देने लगा।इस समय जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्रों का आंदोलन उभर कर आया ।इसका यह फायदा हुआ कि चुनाव में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिला और मिली जुली सरकार का पहली बार उदय हुआ।इस तरह एक नई राजनीति हमारे सामने आई।1980 में पंजाब में हरि क्रांति के विरोध में आंदोलन उभरा जिसका नेतृत्व अकाली दल ने किया।यह फिर धार्मिक आंदोलन और आतंकवाइ में परिवर्तित हो गया जिसका परिणाम आॅपरेशन ब्लू स्टार और इन्दिरा गांधी की हत्या है। लेकिन बाद में यह भी राजनीति व्यवस्था का ही हिस्सा हो गए।1980 के दशक में कश्मीर में हिंसा प्रारंभ हो गयी थी।1990 के दशक में हिंसा ने विराट रूप ले लिया था और उतर पूर्वी इलाको में भी हिंसक गतिविधियां आरंभ हो गयी थी।जिनका उपाय राजनीति प्रक्रिया द्वारा निकला लेकिन कश्मीर का कोई समाधान नहीं निकल सका। इस बार ही 2008 में ही वहां सबसे ज्यादा मतदान किए गए।शायद लोगों का विश्वास अब भारत की राजनीति पर होने लगा है भाषा दलित और महिला को लेकर भी कई आंदोलन हुए या हो रहे है।इनके कारण कला साहित्य और शिक्षा के क्षेत्रा में इनकी भागीदारी तो बढ़ी लेकिन इतने साल में आज भी उन्हें वास्तविक अधिकार प्रापत नहीं हो सका।डाॅ अम्बेडकर के नेतृत्व में दलित आंदोलन तो किया गया किंतु आज भी उनकी स्थिति में कुछ खास परिवर्तन नहीं आए भाषा को लेकर एक ऐसी मुहिम छिड़ गई है जिसने देश की एकता और अखण्डता पर प्रश्न चिहृन लगा दिया है।क्षेत्राीय या भाषा आंदोलन उभरता तो है लेकिन बाद वह भी राजनीति का हिस्सा बन जाते है।महिला आरक्षण देकर उन्हें हक देने की बात करते है लेकिन समाज में उन्हें आज भी अधिकारों से वंचित रखा जाता है।महात्मा गांधी ने जिन्हें हरिजन और वास्तविक समाज कहा उन्ही को अधिकार प्राप्त नहीं है।इसलिए समाज में एक ऐसे आंदोलन की ज़रूरत है जो समाज से इस भेदभाव को मिटा सके लेकिन कोई हिंसक रूप न ल क्योकि हिंसा कोई समाधान नहीं है।

No comments:

Post a Comment