Friday, March 20, 2020







दण्ड
उसके अन्तःमन की पीड़ा घर में और सदस्यों के होने के बावजूद कोई अब तक ना समझ सका था या फिर समझने की चाह ही ना थी। सच ही तो है, किसी के अन्तमन की पीड़ा या बात आजकल के दौर में किसी दूसरे के द्वारा ज्ञात कर लेना निश्चय ही असंभव कार्य प्रतीत होता है, पर अत्याधिक घरों में ऐसा सम्भव होता है, मा, के द्वारा। भला मों के सिवा कौन ऐसा प्राणी है जो अपनी सन्तान चाहे वो पुत्र हो या हो या पुत्री के रोम-रोम से परिचित रहती है। माँ जो खासकर अपनी बेटी की आंतरिक पीड़ा को समझने में अपनी सार्मथ्यता जाहिर करती है। पर ना जाने क्यों इस घर में जैसे हर कोई नियमानुसार पहले से ही स्वार्थ की परत ना इसे स्वार्थ की परिभाषा नहीं दी जा सकती क्योंकि घर के किसी सदस्य पर कोई समस्या आने पर सभी भरपूर सहायता करते मगर इस मदद के पीछे ना जाने क्यों औपचारिकता की बू आती थी। खैर, बात अगर इस घर की हुई है तो इसकी महानता की बात कर ली जाए। इस घर में अपने अन्दर रहने वाले सदस्यों को इकट्ठा करने की हर प्रयास से लेकर उनके बिखरते क्षण के हर लम्हे जैसे कसके जेहन में इस कदर समा गए हैं कि शायद उन लम्हों को भी अपने बिखरने का भय लगता है। अतः वे अतीत में कभी ना बिछुड़ने की कसमें खाकर अभी तक एक साथ हैं। आज काफी चहल-पहल है रायसाहब के मकान में। अब आप सोच रहे होंगे कि रायसाहब की चर्चा कहाँ से गई। अरे जनाब, यह वही मकान है जिसकी स्थिति का परत-दर-परत से आप परीचित हो गए है। हाँ तो उनके मकान में चहल-पहल का कारण है- उनकी बड़ी बेटी साधना की शादी की तैयारी होना। राय साहब अपनी बेटी की शादी में तिनका भर की कमी भी बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। उन्होंने बकायदा अपने  सभी कारिन्दों को सख्त आदेश दे डाला था कि शादी में किसी प्रकार की कमी का दण्ड उन्हें अच्छी तरह भुगतना पड़ेगा। अच्छा चलिए आपको शादी की तैयारियों का मुआयना करा दे। रायसाहब के आदेश पर एक से एक कीमती सजाने वाले सामान लाए गए थे, शहद की सबसे बड़े शहनाई टीम को बुलाया गया था, सबसे अच्छे हलवाई भी अपने काम में तत्परता से लगे हुए थे। सजावट की इससे अच्छी मिसाल भला कहाँ मिली थी आज तक। रायसाहब का सख्त आदेश था कि शादी के बाद कोई भी वस्तु चाहे कितनी भी कीमती क्यों हो, स्मरण हेतु ना रखी जाए और शायद यही गलती उनको जिन्दगी भर सालती रही, जिसके दःख से वो साधना की शादी के आठ-नौ महीने ही बाद चल बसे। माना कि रायसाहब अकूत धनराशि के स्वामी थे। इसी अभिमान में उन्होंने यह आदेश दे डाला था कि - बच्ची उनकी छोटी रीना) की शादी में बड़की साधना की शादी की कोई वस्तु लेशमात्र भी रखी जाए। अब पता नहीं कि बच्ची के बारे में रायसाहब की इतनी अनुकम्पा दष्टि और बड़की के प्रति बेपनाह जलील करने वाला व्यवहार क्यों रहा। शायद उसने एक बार अपने पिता से कहा था कि अपने कॉलेज में पढ़ने वाले अत्यन्त मेधावी छात्र से शादी करना चाहती है और उससे प्यार भी करती है। उसका इस प्रकार खुले स्वर में अपने पिता से अपने प्यार का इजहार करना शायद उनको बहुत खला और उन्होंने बिना इसकी कॉलेज की पढ़ाई भी छुड़ा दी। दोनों बेटियों को पिता से ज्यादा शायद ही कोई चाहता था। रीना का भी यही हाल था, मगर अपनी दीदी का हाल देखकर वह इस बारे में किसी से चर्चा करने स्थिति में नहीं थी। दोनों बेटियों के पास सौन्दर्य, समझदारी का भंडार था। माँ को महल, कोठरी मुहल्ले भर की गप्पत झांकने से ही फुरसत नहीं मिलती थी। फिर बेचारी माँ का भी क्या दोष। दिन-रात के इन भारी क्षणों में महल के अन्दर कैद रहने की जैसे उनको आदत-सी पड़ गयी थी या फिर यह बोझ उन पर लाद दिया गया था। माँ की सौंदर्य और विद्या पर दोनों बहने भी न्योछावर रहती थी। पर उस सौन्दर्य का पान महल के नौकर-चाकर दास-दासियों ही करती थी और फिर समय से पूर्व उनकी ढलती उम्र शायद पिता द्वारा उनको हिकारत की नजरों से दिखने के कारण था। अतः माँ भी सोने के महल में कैद सोने की चिड़िया थी जिसकी हृदय वेदना समझने को किसी में चाह नहीं थीं। यही सोच-सोच कर उनका व्यथित मन यही सोचता था कि, आखिर वह क्यों अपनी बेटियों की सहायता करे, उनके व्यक्ति मन पर क्यों कोई मरहम लगाए। आखिर उनके मन में किसी ने तो झाँकने की कोशिश भी नहीं की थी। जिसका आभाष होते ही उनका व्यथित मन और कुंठित हो जाता। शायद यह परिस्थिति की मार थी और इस विषाद को छुटकी (रीना) अच्छी तरह समझती थी, बड़की (साधना) हमेशा कल्पना लोक में खोई रहती थी और इसी सोच का उसे इतना बड़ा कठोरतम दण्ड मिला कि शून्यविहिन माँ के आँखों से भी अविरल अश्रुधारा बह निकली। पर रीना स्तम्भित हो गयी, उसने उसी वक्त अपनी इच्छाओं का गला घोंट। दिया। साधना अभी भी अपने दण्ड को भली-भाँति नहीं समझ सकी थी। साधना को। दण्ड देने की योजना का पुख्ता इंतजाम रायसाहब ने किया। इसे शादी के बाद मायके के हर अधिकार से बेदखल कर दिया गया। उसकी शादी उसके मनचाहे वर से हुई। जरूर, मगर उसका पति रायसाहब की औकात से काफी नीचे था। लेकिन रायसाहब ने अपने फूल सरीखी पाली गई बेटी साधना पर जरा भी दया नहीं दिखाई। साधना को इस बात का आभास तब हुआ जब उसकी शादी में बाहरी लोगों का उपहार तो मिला, मगर रायसाहब ने घर से एक तिनका तक ना दिया। बेचारी माँ किसी प्रकार चोरी छिपे एक अतयन्त सुन्दर हार साधना को देना चाहा, मगर साधना ने इंकार कर दिया। यह स्पष्ट था कि साधना को विरासत के तौर पर अपने परिवार की तरफ से मात्र इस शादी भर अनुकम्पा मिली। एक राजकुमारी को दासी में परिवर्तित कर दिया गया। साधना जिन्दगी भर एक सवाल हमेशा अपने मन से पूछती रही कि क्या माँ को उसकी अन्त पीड़ा नहीं दिखी। शायद साधना को यह आभास नहीं था कि उसकी माँ का सोने की चिड़िया बनकर रायसाहब की महल में कैद रहना थी एक प्रकार का दण्ड ही था, जो उनके पिता ने उसकी माँ को किसी से प्यार करने के एवज में दिया था। माँ एक कठपुतली बस थी, उसको नचाने वाला रायसाहब थे। वह नहीं जानती थी कि माँ को अपने ही घर में किसी प्रकार का अधिकार नहीं दिया गया था।
                                                       lavanya singh

Sunday, December 8, 2019

देखो आगे क्या होता है?

मुझको बस इतना ही कहना
सुन लो देश की हर एक बहना
लोक-लाज की खातिर अब तुम
कभी किसी का जुल्म ना सहना।

अब विनती काम ना आएगी
तू कितना भी चिल्लाएगी
समाज यहां का अंधा है
अब रोज का ये ही धंधा है।

सिर्फ शहर बदलता रहता है
सब पहले जैसा रहता है
हर बार प्रदर्शन होता है
देखो आगे क्या होता है।









Saturday, December 7, 2019

अक्षर ही असली पूंजी है


कंधे पर बस्ता है भारी
पीठ पे ढोना है लाचारी
लेना है जो इसका ज्ञान
इसे उठाने में ही शान।

पर जो इससे घबराता है
पढ़ने से वो कतराता है
फिर जीवन भर पछताता है
और पीठ पे कचड़ा लाता है।

इसलिए कहा मेरा मानो
और रोज सुबह जल्दी जागो
स्वस्थ हमें जो रहना है
तो मॉर्निंग वॉक भी करना है।

एक अच्छा बाबू बनना है तो
नैतिक शिक्षा का पाठ करो
एक अभियंता जो बनना है तो
गणित का खूब अभ्यास करो।

पढ़-लिखकर अच्छा काम करो
मां-बाप का जग में नाम करो
अध्ययन जीवन की कुंजी है
अक्षर ही असली पूंजी है।

आकाश कुमार 'मंजीत'






Friday, December 6, 2019

भाभी सुख की चाभी

हम जिनको कहते हैं भाभी
उनके पास है सुख की चाभी
इन चाभी के गुच्छों की
बहुत बड़ी है जिम्मेदारी।

घर की मालकिन कहलाती है
पशुओं को भी नहलाती है
घर के सारे काम वो करती
सब के दिल पे राज वो करती।

घर में प्रेम की वर्षा होती
किस्मत पर वो कभी ना रोती
मेहनत पर है उन्हें यकीन
कविता लिखने की शौकीन

जब से बनी है घर की मुखिया
नहीं कोई है घर में दुखिया
घर लगता अब मंदिर जैसा
यही है असली रुपया-पैसा।

आकाश कुमार 'मंजीत'




Sunday, December 1, 2019

हर शहर हर गांव में ये बीमारी है

रात काली है, घोर लाचारी है
हैवान घूमते हैं सड़क पर
बनाने किसी अबला को शिकार
हर शहर, हर गांव में ये बीमारी है।


बहुत मेहनत की ये मुकाम पाने में
कई मुश्किलें पार की यहां आने में
क्या बिगाड़ा था हमने किसी का?
क्यों नहीं हाथ कांपा? मुझे जलाने में।





Tuesday, November 26, 2019

पहले वाली बात नहीं है

विश्वसनीय साख नहीं है
दिल अब इसके पास नहीं है
मुगलों की इस दिल्ली में
पहले वाली बात नहीं है।


जिस दिल्ली के शौर्य का डंका
दूर-दूर तक बजता था
जिस दिल्ली का हिस्सा होना
हर राजा का सपना था
जिस दिल्ली की सुंदरता
एक सम्मोहन के जैसा था
जिस दिल्ली की सीमा पर
अभेद किले सा पहरा था।

उस दिल्ली की हवा में अब तो
सुबह- शाम दम घुटता है
उस दिल्ली की दशा देखकर
रूह भी अब कांप उठता है
उस दिल्ली के शोर में अब तो
कई चीखें दब जाती है
उस दिल्ली की पावन यमुना
अब नाली कहलाती है।

प्रेम-प्यार की बातें करती
मधुर मिलन की रात नहीं है
दिलवाले की दिल्ली में अब
पहले वाली बात नहीं है।





Monday, November 25, 2019

आलोचना नहीं करूंगा

मैं सरकार का समर्थक
आलोचना नहीं करूंगा
प्याज भले हो जाए 70 पार
टमाटर क्यों ना हो जाए लाल
सेठ साहूकार हो जाएं मालामाल
भले आम जनता हो जाए कंगाल
मैं सरकार का समर्थक
आलोचना नहीं करूंगा।
भले उच्च डिग्री लेकर हाथ मलना पड़े
परिवार चलाने के लिए पकौड़ा तलना पड़े
45 सालों का रिकॉर्ड भले टूट जाए
किस्मत सदा के लिए चाहे रूठ जाए
मैं सरकार का समर्थक
आलोचना नहीं करूंगा।
चौथे स्तंभ पर छाने लगे संकट
संपादक की जगह ले ले कोई लंपट
मीडिया सेट करने लगे एजेंडा
देश में फैलाने लगे प्रोपोगेंडा
मैं सरकार का समर्थक
आलोचना नहीं करूंगा।
विश्व पटल पर रुपए का गिरने लगे भाव
बाज़ार में निवेशकों कम हो जाए चाव
भले उत्पादन पर लग जाए पूर्ण विराम
कर्मचारी करने लगे घर में आराम
मैं सरकार का समर्थक
आलोचना नहीं करूंगा।