Wednesday, May 5, 2010

एक थी निरूपमा


आज मेरी जुबान लड़खड़ा रही है....मेरे गले से शब्द नहीं निकल रहे....मैंने कभी नहीं सोचा था कि अपने बीच से ही किसी को खबर बनते देखूंगा....कल तक जो निरुपमा मेरी एक दोस्त हुआ करती थी और दोस्त से ज्यादा मेरे करीबी दोस्त प्रियभांशु की होने वाली जीवनसंगिनी यानि हमारी भाभी....आज वो साल की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री बन चुकी है....मेरे सामने उसी निरुपमा पाठक की स्टोरी वाइस ओवर के लिए आती है....एक आम स्टोरी की तरह जब मैं इस स्टोरी को अपनी आवाज में ढालने की कोशिश करता हूं तो मेरी जुबान लड़खड़ाने लगती है....मेरे गले से शब्द नहीं निकलते....इस स्टोरी को पढ़ता-पढ़ता मैं अपने अतीत में लौट जाता हूं....मुझे याद आने लगते हैं वो दिन जब आईआईएमसी में प्रियभांशु और निरुपमा एकांत पाने के लिए हम लोगों से भागते-फिरते थे और हम जहां वो जाते उन्हें परेशान करने के लिए वही धमक जाते....हमारा एक अच्छा दोस्त होने के बावजूद प्रियभांशु के चेहरे पर गुस्से की भंगिमाएं होतीं लेकिन हमारी भाभी यानि नीरु के मुखड़े पर प्यारी सी मुस्कान....हम नीरु को ज्यादातर भाभी कहकर ही बुलाते थे हालांकि इसमें हमारी शरारत छुपी होती थी....लेकिन नीरु ने कभी हमारी बातों का बुरा नहीं माना....उसने इस बात के लिए हमें कभी नहीं टोका....नीरु गाती बहुत अच्छा थी....हम अक्सर जब भी मिलते थे नीरु से गाने की फरमाइश जरुर करते और नीरु भी हमारी जिद को पूरा करती....शुरुआती दिनों में हमें इन दोनों के बीच क्या पक रहा है इस बारे में कोई इल्म नहीं था....बाद में एक दिन प्रियभांशु जी ने खुद ही नीरु और अपने सपनों की कहानी हमें बतायी....दोनों एक-दूसरे से बेइंतहा मोहब्बत करते थे....दोनों एक-दूसरे से शादी करना चाहते थे....दोनों अपने प्यार की दुनिया बसाने के सपने संजो रहे थे....मजे की बात ये कि प्रियभांशु बाबू भाभी की हर बात मानने लगे थे....आईआईएमसी के दिनों प्रियभांशु बाबू और मैं सुट्टा मारने के आदि हुआ करते थे....एक दिन जब मैंने प्रियभांशु से सुट्टा मारने की बात कही तो उसने ये कहते हुए मना कर दिया कि नीरु ने मना किया है....मतलब प्रियभांशु पूरी तरह से अपने आप को नीरु के सपनों का राजकुमार बनाना चाहता था....वो क्या चाहती है क्या पसंद करती है प्रियभांशु उसकी हर बात का ख्याल रखता....हालांकि उस वक्त हम उसे अपनी दोस्ती का वास्ता देते लेकिन तब भी वो सिगरेट को हाथ नहीं लगाता.....अचानक वॉइस ओवर रुम के दरवाजे पर थपथपाने की आवाज आती है....मैं एकदम अपने अतीत से वर्तमान में लौट आता हूं....वर्तमान को सोचकर मेरी रुह कांप उठती है....मेरी आंखें भर आती हैं....टीवी स्क्रीन पर नजर पड़ती है और उस मनहूस खबर से सामना होता है कि वो हंसती, गाती, नीरु अब हमारे बीच नहीं है....समाज के ठेकेदारों ने उसे हमसे छीन लिया है....नीरु अब हमारी यादों में दफन हो चुकी है....नीरू साल की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री बन चुकी है....वो मर्डर मिस्ट्री जिससे पर्दा उठना बाकी है....क्यों मारा गया नीरु को....किसने मारा नीरु को....आखिर नीरु का कसूर क्या था ?....क्या अपनी मर्जी से अपना जीवनसाथी चुनना इस दुनिया में गुनाह है....क्या किसी के साथ अपनी जिंदगी गुजारने का सपना देखना समाज के खिलाफ है....हमें मर्जी से खाने की आजादी है....मर्जी से पहनने की आजादी है....मर्जी से अपनी करियर चुनने की आजादी है तो फिर हमें इस बात की आजादी क्यों नहीं है कि हम किस के साथ अपनी जिंदगी बिताएं....आज ये सवाल मुझे झकझोर रहे हैं....

Monday, May 3, 2010

हरित क्रांति

हरित क्रांति के सन्दर्भ में मेरे द्वारा जो भी बात कही गयी है, उन सबसे यंही निष्कर्ष निकलता है कि देश को कृषि क्षेत्र में दूसरी हरित क्रांति कि जरुरत है..

Friday, April 30, 2010

आर, टीवी बैच की निरुपमा नहीं रही

मैं इस समय अपने बेंगलुरू के ऑफिस में बैठी ये पोस्ट लिख रही हूं। आज सवेरे ही पता लगा कि हमारे बैच की एक साथी निरुपमा पाठक ने अपने घर पर आत्महत्या कर ली। निरुपमा पाठक या नीरू आर, टीवी बैच की भोली सी लड़की थी। हमारे हिंदी बैच के ज्यादातर साथी उसे प्रियभांशु रंजन की दोस्त के रूप में जानते थे। हम सभी जानते थे कि वह दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं। पता तब भी था कि दोनों के जीवन की राहें उनके साथ रहने के फैसले के बाद रपटीली हो जाएंगी। लेकिन ये नहीं पता था कि ये समाज उन्हे जीने भी नहीं देगा।

 नीरू के बारे में आत्महत्या की खबरें आ रही हैं । नीरू बिजनेस स्टैंडर्ड इंग्लिश की एक पत्रकार थी। वह किसी गांव, कस्बे की भोली, असहाय, परिवार पर निर्भर लड़की नहीं थी। जिसके पास अपने परिवार का तालिबानी फरमान मानने के अलावा कोई चारा ना रहा हो।  इसलिए यह मसला आत्महत्या से ज्यादा कहीं और कुछ प्रतीत होता है। वह आत्म-निर्भर थी। अपने फैसले लेने का उसे पूरा हक था। जाहिर है इस शिक्षा और संस्कार ने ही उस में अपने फैसले खुद लेने की योग्यता भरी थी। वही लड़की जब दिल्ली से अपने माता-पिता को मनाने घर जाती है तो इतनी कमजोर हो जाती है कि आत्महत्या का निर्णय ले लेती है। ये बेहद आश्चर्यजनक है। 

मुझे यहां बेंगलुरू में बैठ कर मोहल्ला और भड़ास फॉर मीडिया के माध्यम से जो खबरें मिलीं। उस से मुझे लगता है कि मामला सिर्फ इतना नहीं है। पोस्ट मार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही पता चलेगा कि असली बात क्या है? लेकिन हम सब जो पूरा साल प्रियभांशु और नीरू की प्रेमकहानी के गवाह रहे हैं। उनसे ये अपील है कि इस मामले को दबने ना दें। शायद यही वह इकलौती चीज है जो हम नीरू के लिए कर सकते हैं। 

स्वागत का टेक्स्ट बदला


मित्रों!

आप सभी ने ' इसमंच का क्या करें ' वाली पोस्ट पढ़ी होगी। कुछ महत्वपूर्ण सुझाव आये हैं । आज से स्वागत का टेक्स्ट बदल दिया गया है ।

सुझाओं का अब भी स्वागत है।

संवाद

Wednesday, April 28, 2010

सब अपनई हयेन

मैंने अपने मित्र अरविन्द का एक लेख पढा जिसमें भारत की विद्वानों की यूनीवर्सिंटी माने जाने वाली जेएनयू में बदलते राजनैतिक बहार की महक महसूस हुई। सच में बदलाव ही किसी प्रक्रिया की व्यवहारिकता है। हम सभी किसी न किसी राजनैतिक विचारधारा के समर्थक हो सकते हैं उस विचारधारा के समर्थक होने के नाते हमारा उस विचारधारा के प्रति झुकाव भी जायज है लेकिन उस विचारधारा के चलते हम मानवीयता के पैमानों को भूल जायें ये कौन सी विचारधारा का हिस्सा है। राजनीति में तो मानवीय पहलू ही केंद्र में होते हैं अगर आदिवासीयों के हक की लड़ाई लड़ रहे लोग मानवीयता की दुहाई देते हैं तो दंतेवाड़ा में मारे जाने वाला सिपाही कौन हैं । आखिर मानवीयता का कौन सा पैमाना इस हिंसा को जायज ठहरा सकता हैं। दंतेवाड़ा की हिंसा को किसी भी कीमत पर सहीं नहीं कहाँ जा सकता है। अभी हिन्दुस्तान की ओर से हमें लखनऊ भेजा गया हैं और दंतेवाड़ा में मारे गयें जवानों में से 42 उत्तर प्रदेश के थे और उन में से 25 जवानों के पार्थिव शरीर को अमौसी हवाई अड्डे पर उतार कर उनके गृह जनपदों को भेजा जाना था तो हमें भी मौका मिला वहाँ जाने का । बड़ा ही खामोश मंजर था सच में 400 से 500 की भीड़ के बाद इतनी खामोशी मैनें अपने जीवन में कभीं नहीं महसूस की, एक एक करके 25 शवों के बाद विचारशून्यता सी स्थिति न कोई भाव न कोई नक्सलवाद की बहस का विचार सिर्फ एकटक उनकी ओर निहारता रहा जो वहाँ थे ही नहीं। नया नया पत्रकार तो खबर लिखनी ही थी तो कुछ ऐसा लिखनें की इच्छा थी जो सच्चे चित्र उभार सके, तो देखा कि पास में कुछ महिलाएं रो रहीं है सारा मि़डिंया का मुँह उन्हीं की ओर सबने समझा किसी शहीद के परिवारी जन होगें । पहला सवाल आप का कोई परिवारीजन इसमें हैं कया ? जवाब मिला “सब अपनई त हयेन” इसके बाद किसी ने कुछ नहीं पूछाँ। सच में ये मानवीय पहलू हैं जिसें हमें समझना होगा।

Monday, April 19, 2010

'मेरी फितरत ऐसी तो नहीं थी'

इंसान के लिए इंसान के पास वक्त नहीं....बस सब एक-दूसरे से दूर भागने में लगे हैं और आज मैं भी उन लोगों की जमात में शामिल हो गया हूं जो किसी को मरता देखकर भी उसकी मदद करने के बजाय मुंह उठाकर आगे बढ़ जाते हैं....दोपहर के करीब ढाई बजे थे....मैं रिंग रोड पर चिड़ियाघर की रेड लाइट के पास से गुजर रहा था....तभी अचानक मेरी नजर सड़क किनारे पड़े एक युवक पर पड़ी....वो सड़क के किनारे खून से लथपथ पड़ा था....उसके सिर से लगातार खून बह रहा था और उसके आसपास की सड़क खून से लाल हो चुकी थी....लोग उसे देखकर रहम की आह भरकर आगे बढ़ते जा रहे थे लेकिन किसी ने इतनी जहमत नहीं उठाई कि वो उस इंसान की मदद करें....जबकि वो इंसान अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था....एकाएक मेरे दिल में ख्याल आया कि मैं रुककर इस शख्स की मदद करुं....लेकिन उसी क्षण मेरे अंदर एक और आवाज आई और उसने मुझसे कहा आखिर क्या जरुरत पड़ी है पंगा मोल लेने की....सड़क पर इतने लोग हैं न कोई तो रहम खाकर इसकी मदद कर ही देगा....ये सोचते हुए मैंने अपनी बाइक की रफ्तार और तेज कर दी और मैं वहां से आगे बढ़ गया....बाइक चलाने के दौरान भी वो शख्स मेरी आंखों के आगे घूम रहा था....वही खून से लथपथ पड़ा शख्स बार-बार मुझे झकझोर रहा था....मुझे लगता था कि कहीं वो शख्स मर तो नहीं जाएगा....अब मैं अपने आपसे सवाल करने लगा कि आखिर क्यों मैंने इस शख्स की मदद नहीं की....क्यों मैंने सड़क किनारे जिंदगी के लिए जूझ रहे उस इंसान पर रहम नहीं खाया....कल को मेरे साथ भी कोई खतरनाक हादसा पेश आ सकता है....मैं भी सड़क पर खून से लथपथ जिंदगी और मौत के बीच झूल सकता हूं....ये क्या हो गया है मुझे....मैं इतना स्वार्थी कैसे हो गया लेकिन इन सवालों का जवाब मेरे पास भी नहीं....मैं खुद नहीं जानता कि आखिर मैं कैसे इतना पत्थरदिल हो चुका हूं....मेरी फितरत तो ऐसी नहीं थी....रात को बिस्तर पर जाने के बाद भी मैं खुद से यही सवाल करता रहा लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं सुझा....आज भी वो चेहरा मेरी आंखों से ओझल नहीं होता....मैं अब भी इन सवालों का जवाब ढूंढने की कोशिश कर रहा हूं....

Saturday, April 3, 2010

इस मंच का क्या करें




प्रिय दोस्तों !

आशा है आप सभी जहाँ भी हैं सकुशल हैं। पिछले कुछ वर्षों से संवाद के जरिये हम सब अपने को अभिव्यक्त करते रहें हैं। इसमें बुनियादी सूत्र आईआईएमसी रहा है। लेकिन आप सभी को पता होगा कि मै भौतिक रूप से आईआईएमसी में नहीं हूँ। हालाँकि इस परिवर्तन से आप सभी से लगाव में कोई फर्क पड़ा है ऐसा कत्तई नहीं है । परन्तु संवाद के परिचय में आईआईएमसी की कार्यशाला लिखकर चलाने में थोड़ी असुविधा लग रही है। क्योंकि आगामी बैच से मेरा सीधा वास्ता नहीं होगा ।

आप सभी की राय जानना चाहूँगा कि इस मंच का क्या करें ?

आप सभी के सुझाव का इंतजार रहेगा। उम्मीद है बातचीत से नयी राह मिलेगी ।

शुभकामनाओं सहित

संवाद