Saturday, July 9, 2011
मेरी प्यारी सी मंजिल
Tuesday, December 7, 2010
लोकतंत्र के लिए शर्मनाक ;बसपा के नेता ने चुनाव जीतने के लिए करवाया अपहरण
रविवार को उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिला न्यायालय व कलेक्ट्रेट के सामने गुंडई की जो घटना हुई वह यहाँ के इतिहास में पहली बार है। दबंगों ने जिले के माथे एक कलंकित दास्तान लिख दी, जबकि डीएम व एसपी घटना से चंद कदमों की दूरी पर बैठे हुए थे। सैकड़ों पुलिस कर्मियों व भीड़ के समक्ष एक पूर्व जिला अध्यक्ष साधना चौधरी गिड़गिड़ाती व बिलबिलाती रहीं और असलहों की नोक पर दबंग उनके दो प्रस्तावकों को उठा ले गये।
भाजपा समर्थित प्रत्याशी साधना चौधरी के मुताबिक वह दोपहर 1।45 बजे अपने प्रस्तावकों समेत पैदल कलेक्ट्रेट की तरफ जा रही थी। इस दौरान दूसरे प्रत्याशी के समर्थकों ने असलहे का प्रदर्शन करते हुए उनके प्रस्तावक/जिला पंचायत सदस्य राजाराम लोधी व प्रेम नारायण को जबरिया एक लक्जरी वाहन में बैठा लिया और फरार हो गये। इसका विरोध करने पर दूसरे प्रत्याशी के समर्थकों ने साधना चौधरी के पुत्र सिद्धार्थ चौधरी व भाजपा कार्यकर्ताओं से मारपीट की।
नामांकन के बाद अपराह्न 3 बजे से हुई जांच के दौरान जिलाधिकारी द्वारा प्रस्तावक की गैरहाजिरी के सवाल पर साधना चौधरी ने बताया कि उनके प्रस्तावक को अगवा कर लिया गया है, ऐसे में उनकी उपस्थिति संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि अपहरण के मामले में उन्होंने सदर थाने में नामजद तहरीर भी दिया है।
रविवार दोपहर ने बदनामी की जो दास्तान लिखी उससे जनपदवासी वर्षो उबरने वाले नहीं हैं। ठीक उस वक्त जब जिलाधिकारी प्रज्ञान राम मिश्र व पुलिस अधीक्षक महेश कुमार मिश्रा नामांकन कक्ष में बैठकर नामांकन कार्य में लगे हुए थे, बाहर मर्यादा की धच्जियां उड़ाई जा रही थीं। ऐसा भी नहीं था कि बाहर फोर्स की कोई कमी थी। दो पुलिस क्षेत्राधिकारी, छह थानाध्यक्ष समेत सैकड़ों पुलिस कर्मी कलेक्ट्रेट द्वार से लेकर इर्द-गिर्द मोर्चा संभाले हुए थे। यही नहीं कलेक्ट्रेट के दोनो तरफ बैरियर बनाये गये थे। बावजूद इसके दर्जनों चौपहिया वाहन भीतर कैसे पहुंचे। इसका आसान सा जवाब यही है कि बिना प्रशासनिक मिली भगत के नहीं। यही नहीं हाथों में असलहा लहराते हुए उन्होंने सारी मर्यादाएं तार-तार कर दीं। नियमत: जिले में धारा 144 लागू है। बावजूद इसके लोग एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों की संख्या में नजर आये। इतना ही कलेक्ट्रेट परिसर के ठीक बाहर लगा पंडाल तथा वहां मौजूद दर्जनों कुर्सियां इस बात की गवाही देने के लिए काफी हैं कि सबकुछ प्रशासन की जानकारी में था। घटना के ऐन मौके पर सभी मीडिया कर्मियों को एक व्यक्ति द्वारा गुमराह किया जाना भी साजिश का एक अंग बताया जाता है। बाद में मीडिया कर्मी जब प्रेस कांफ्रेंस के लिए लोनिवि विभाग के डाक बंगले पर पहुंचे तो पता चला कि वहां प्रेस कांफ्रेंस की कोई तैयारी ही नहीं थी। आनन-फानन में जब वह लौटकर कलेक्ट्रेट परिसर के पास पहुंचे तो पता चला कि सामने असलहा लहराते हुए दबंगों की फौज, जिला पंचायत अध्यक्ष पद की भाजपा प्रत्याशी व पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष साधना चौधरी के दो प्रस्तावकों को अगवा करने में लगे हुए थे। इस दौरान कुछ मीडिया कर्मियों को दबंगो चेतावनी भी दी कि यदि उन्हें कवरेज की कोशिश की तो अच्छा नहीं होगा। जाहिर है कि सबकुछ प्री-प्लान था। इस दौरान अज्ञात दबंगों ने साधना चौधरी के पुत्र सिद्धार्थ चौधरी के ऊपर वाहन चढ़ाने की भी कोशिश की, यह और बात थी कि बगल होकर उसने अपने आप को बचा लिया।
सिद्धार्थनगर में पिछले कुछ महीनों से संतकबीर नगर के बसपा नेता पूर्व सांसद भालचंद यादव हाल ही में हुए पंचायत चुनाव में धन बल -बाहुबल से अपने पुत्र प्रमोद यादव को जिला पंचायत सदस्य बनाने में सफल रहे। इसके बाद रविवार को उनके गुंडों ने लोकतान्त्रिक मूल्यों को तार-तार कर दिया। मजे कि बात यह है कि यह सारी घटना जिले में तब हुयी जब प्रदेश सरकार के पंचायती राज्य मंत्री दद्दू प्रसाद डाक बगले पर मौजूद थे.
हालांकि जिलाधिकारी प्रज्ञान राम मिश्रा का कहना है कि पुलिस अधीक्षक से घटना की आख्या मांगी गयी है और जो भी दोषी मिलेगा, उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जायेगी।
"मशाल"
Wednesday, June 16, 2010
ऐसा था फैसले का दिन
भोपाल गैस त्रासदी में निचली अदालत का फैसला आ चुका है। फैसले से सभी लोग खफा होंगे और गुस्से में भी। लेकिन मैं यहां न तो हमारी सुस्त न्याय प्रणाली पर कोई बात दोहराना चाहता हूं और न ही एंडरसन के करोड़ों-अरबों के वारे न्यारे का जिक्र करना चाहता हूं। मैं तो बस चंद वे बातें आपसे साझा करना चाहता हूं जो मैंने पिछले तीन दिनों के दौरान महसूस की। ये सारी बातें इस भीषण त्रासदी से अलग नहीं हैं। यदि आपके पास इसके लिए भीषण शब्द से भी भीषण कोई शब्द हो तो मुझे सुझाइगा जरूर। क्योंकि यह शब्द मुझे इस त्रासदी को त्रासदी कहने के लिहाज से बहुत छोटा लगता है।
बहरहाल आज की बात है तो फैसले से ही जुड़ी हुई लेकिन उस तरह नहीं जिस तरह अखबारों में खबरें छपीं। मैं इन दिनों भोपाल में ही हूं और संयोग से मुझे गैस पीड़ितों से मिलने, उनके साथ खाने-पीने, उस इलाके को देखने और उसकी आबो-हवा को महसूस करने का मौका मिला। खबरनवीस अपनी जगह हैं, वे अपने तरीके से खबरें देते हैं। मुझे उनसे कोई शिकवा नहीं है। इस मुद्दे पर अब तक कई बुद्धिजीवियों की कलम चल चुकी है। लेकिन मैं यहां किसी खबरनवीस या बुद्धिजीवी की हैसियत से नहीं बल्कि मुल्क के एक संवेदनशील और सिस्टम द्वारा प्रताड़ित शख्स की हैसियत से ये सारी बातें आपसे साझा करना चाहता हूं। ये बातें उस वक़्त की हैं, जब अदालत में फैसले की कार्रवाई चल रही थी। ये बातें उस समय की हैं, जब लोग धारा 144 को धता बताते हुए झुंड के झुंड में अदालत के बाहर जमावड़ा लगाये हुए थे। ये बातें उस समय की भी हैं, जब मध्यप्रदेश पुलिस की इतनी हिमाकत हो गयी कि उसने वरिष्ठ पत्रकार और इस मामले में सबसे पुराने कार्यकर्ता राजकुमार केसवानी की गिरेबान तक में हाथ डाल दिया और उनके साथ धक्का-मुक्की हुई।
दरअसल फैसले की सुबह मैं भोपाल के जेपी नगर, कैंची छोला, रिसालदार कॉलोनी, राजेंद्र नगर और यूनियन कार्बाइड कारखाने के ही चक्कर लगा रहा था। ये सभी गैस से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में हैं। मैं वहां इस बात की टोह लेने पहुंचा था कि कहीं गुस्साये लोग कोई प्रदर्शन या धरने की तैयारी तो नहीं कर रहे हैं। लेकिन वहां ऐसा कुछ भी नहीं था। फैसले के दिन की सुबह रोजाना जैसी थी भी और नहीं भी। जब वहां कोई धरना प्रदर्शन नहीं हो रहा था, तो बड़ा सवाल यह है कि आखिर उस सुबह वहां हो क्या रहा था।
यूनियन कार्बाइड कारखाने के सामने चिलचिलाती धूप में तपती उस औरत का वह स्टेच्यू आज जैसे अकेले ही अदालत के फैसले के इंतजार में था। यह स्टेच्यू हादसे के बाद बनाया गया था। जेपी नगर की सुबह आज कुछ ज्यादा अलग नहीं थी। रोजाना की तरह आज भी लोग अपने-अपने काम पर चले गये थे। लड़कों का झुरमुट जो शायद स्टेच्यू के पास वाली दुकान पर बैठने के लिए ही बना था, आज भी वैसे ही गपबाजी कर रहा था। वहीं पास में चौकड़ी लगाये कुछ आदमी ताशों के सहारे अपना वक्त काट रहे थे। लेकिन इन सबके बीच जेपी नगर की हवा में यूनियन कार्बाइड की 25 साल पुरानी वह गैस जैसे आज फिर से फैल रही थी। फर्क सिर्फ इतना था कि आज उसकी रफ्तार बहुत धीमी थी। दरअसल वक्त की रफ्तार के आगे वह हार मान चुकी थी।
ताश खेलते लोगों के बीच अदालत के फैसले को लेकर न तो बहुत उत्साह था और न ही बहुत ज्यादा मायूसी। उनके बीच फैसले की छुटपुट बातें तो हो रही थीं लेकिन वे तो अपना फैसला जैसे बहुत पहले ही सुना चुके थे। अब उनमें से ज्यादातर लोग उस बारे में बात करने के इच्छुक नहीं थे। घूम-फिरकर जुबां पर मुआवजे की बातें ही आ जाती थीं। तभी पास की चाय वाली गुमटी से गालियों की आवाजें सुनाई पड़ीं। गुमटी में जाकर चाय पीते हुए उनमें घुल मिल जाने पर मालूम हुआ कि ये ‘श्रीवचन’ वॉरेन एंडरसन के लिए थे। फिर मेरे अनजानेपन को दूर करते हुए 30 साल का एक नौजवान अतीत को याद करते हुए बताने लगा कि उस रात गैस को जमीन पर चलते हुए साफ देखा जा सकता था। इतने में एक दूसरा लड़का बोल उठा, तब हिंदू मुसलमान सब बराबर थे। बस लाशों के ढेरों को जलाया और दफनाया जा रहा था। उफ! वह कितना खौफनाक मंजर था। तभी तीसरा लड़का बताने लगा, अरे वह बबली याद है? कैसे वह भैंसों के बीच दबी हुई थी और अल्लाह का शुक्र है कि वो जिंदा थी। जबकि सारी भैंसे मर चुकी थीं। फिर अदालत के फैसले की बात करते हुए वे कहने लगे, एंडरसन इतना पैसा दे चुका है, अब उसे क्या सजा होगी। उस दिन के बाद वह इधर दिखाई नहीं दिया वरना उसका निपटारा तो तभी कर देते। इतने में चाय बनाने वाली अम्मा अपना दर्द बांटने लगी। वह कहने लगी कि कुछ मुआवजा मिले तो हम बूढ़े लोगों का गुजारा हो। गुमटी के बाहर जिंदगी अपनी रफ्तार से चल रही थी। बच्चे और महिलाएं पानी के लिए लाइन में लगे हुए थे। इस बीच एक फेरी वाला आ गया और वे सूट देखने में व्यस्त हो गयीं।
यूनियन कार्बाइड कारखाने में आज सुरक्षा बढ़ा दी गयी थी। आम दिनों में यहां 30 सुरक्षाकर्मी होते हैं लेकिन आज इनकी तादाद लगभग 150 थी। ये कारखाने के अलग अलग दरवाजों पर खाटों पर आराम फरमाते हुए पहरेदार थे। हालांकि एएसआई वीके सिंह इस बात से इनकार करते हैं कि इतनी सुरक्षा आज ही बढ़ायी गयी है। उनके मुताबिक रोजाना इस कारखाने की सुरक्षा में इतने ही लोग रहते हैं। जबकि दो दिन पहले ही कारखाने के सुरक्षाकर्मियों ने मुझे बताया था कि यहां रोजाना 30 लोगों की ड्यूटी रहती है।
कैंची छोला में अपनी दो जून की रोटी के लिए राशन की लाइन में लगे लोग सार्वजनिक बात से बेखबर दिखाई दिये कि अदालत का कोई फैसला भी आने वाला है। उनके बीच पड़ोसियों के झगड़े और काम धंधे की बातें होती रहीं। लगभग यही हाल राजेंद्र नगर इलाके का भी रहा। हां, छोला फाटक से दस कदम की दूरी पर एक मिठाई की दुकान पर लोगों में उत्सुकता थी कि फैसला क्या हुआ। सवा बारह से साढ़े बारह बजे तक आने वाला हर आदमी पूछ रहा था क्यों क्या फैसला हुआ। कयास लगाये जा रहे थे, जुर्माना हुआ होगा। उनके पास सिर्फ इतनी खबर थी कि फैसला आ चुका है। वे टीवी पर पल पल की खबर देखना चाहते थे लेकिन मजबूर थे, बिजली नहीं थी।
रिसालदार कॉलोनी पहुंचते पहुंचते एक बज चुका था। गलियों में इक्का दुक्का लोग ही बैठे नजर आये। यहां भी आज का फैसला किसी बड़ी चर्चा का विषय नहीं बन पाया था। शब्बन चचा ने बताया कि लोगों में हल्की फुल्की बातें तो सुबह हो रही थीं कि आज फैसला आने वाला है। लेकिन उसके बाद सभी अपने अपने काम पर निकल गये। उनका कहना था कि जब कोई मुआवजा ही नहीं तो फिर किस बात का फैसला। वहीं रिसालदार कॉलोनी के सुमित की दुकान लड़कों का अड्डा बनी हुई है। इस दुकान पर कानूनी पेचीदगियों की बातें सुनने को मिलीं। वहां चर्चा हो रही थी कि सजा ज्यादा से ज्यादा तीन साल की हो सकती है। उसके बाद भी वे अपील कर सकते हैं। तो फैसला किस बात का। बस जल्दी से जल्दी मुआवजा मिलना चाहिए। वैसे भी समय निकलता जा रहा है, तो सजा का कोई मतलब नहीं रहा। इनके बीच भी बिजली न होने का अफसोस दिखाई दिया। अब सभी को एक साथ तीन चीजों का इंतजार था। दो बजने का, बिजली आने का और भोपाल के गुनहगारों को हुई सजा सुनने का।
यह पोस्ट मोहल्ला लाइव पर प्रकाशित हो चुकी है.
Thursday, May 20, 2010
लौट कर आना नीरू
लौट कर आना नीरू
तुम चली गई यूँ ही सबसे रूठ कर
बिना कुछ कहे बिना कुछ बोले बिना लड़े
तुम चली गई नीरू
तुम्हे जाना पड़ा जानती हो क्यूँ
मैं जानती हूँ नीरू क्यूंकि मैं भी तुम्हारी ही तरह औरत हूँ
तुम्हे जाना पड़ा क्यूंकि तुम समर्थ थी स्वतंत्र थी
तुम थी एक सोच लिए तुम्हारी अपनी पसंद थी
इसका कर्ज तुमने चुकाया और चुकाना भी था
क्यूंकि तुम एक औरत थी ना नीरू
लेकिन तुम आना, फिर से आना नीरू
और मैं जानती हूँ
तुम आओगी, तुम लौट कर आओगी मुझ में
हर उस लड़की में जो तुम जैसी है
मासूम निष्पक्ष अपने दम पर जीने की चाह लिए
तुम आओगी उन हजारो आँखों में
जो तुम्हारी चमकीली आँखों सी चमक लिए है
तुम आओगी उन दिलों में जो तुम सी चाह लिए हैं
उन पंखो में जो तुम्हारी तरह उड़ने को तैयार खड़े हैं
तुम आओगी नीरू
लौट कर आना नीरु
'स्मिता मुग्धा
दैनिक भास्कर
Tuesday, May 18, 2010
आतंकवादी हैं नक्सली

अमित कुमार यादव
Monday, May 10, 2010
वक्त करवट लेता है
निरूपमा की मौत के मामले में अब मीडिया ट्रायल शुरु हो गया है....निरूपमा जिसकी कोई उपमा नहीं है
उसे तरह-तरह की उपमाएं दी जाने लगी हैं....साथ ही प्रियभांशु को भी बख्शा नहीं जा रहा....इस मामले में अब मीडिया ट्रायल शुरु हो चुका है....वो प्रियभांशु रंजन जो मीडिया ट्रायल पर आईआईएमसी में किए एक नाट्य मंचन का हिस्सा था....आज वो खुद मीडिया ट्रायल का शिकार हो चुका है....निरूपमा की मौत का मामले जब प्रकाश में आया तो प्रियभांशु को निरुपमा का दोस्त बताया गया....हर चैनल प्रियभांशु को निरुपमा का दोस्त लिखकर संबोधित कर रहा था....कहानी धीरे-धीरे आगे बढी और चैनल वालों को इसमें मसाला दिखने लगा....निरुपमा का दोस्त अब निरुपमा का प्रेमी, निरूपमा का आशिक बन चुका था....यही नहीं मीडिया प्रियभांशु को ही कठघरे में खड़ा करने लगा....कई चैनलों ने अपने पैकेज में चलाया....कठघरे में आशिक....आशिक पर कसा शिकंजा....मीडिया से पूछा जाना चाहिए कि प्रेमी, आशिक जैसे फूहड़ शब्दों का प्रयोग करना कितना जायज है और किसने हक दिया इन चैनलों को जो प्रियभांशु को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं....मुझे याद आ रहा है आईआईएमसी का वो नाटक जब एक मीडिया ट्रायल की एक सत्य घटना पर आधारित कहानी पर हमने एक नाट्य मंचन का आयोजन किया था....प्रियभांशु इस नाटक में टीवी एंकर की भूमिका में था और मैं इस नाटक में रिपोर्टर का किरदार निभा रहा था....इस नाटक में हमने दिखाने की कोशिश की थी कि कैसे मीडिया एक दंपत्ति की मौत का कारण बन जाता है....एक लड़की अपने मामा पर अपने साथ बलात्कार करने का आरोप लगाती है....ये खबर मीडिया में हाथों-हाथ ली जाती है और शुरु होता है मीडिया ट्रायल....मीडिया मामा पर आरोप साबित होने से पहले ही उसे वहशी मामा, दरिंदा मामा कहना शुरु कर देता है....नतीजा बदनामी के डर से लड़की के मामा-मामी आत्महत्या कर लेते हैं....लेकिन बाद में जब वास्तविकता से पर्दा उठता है तो सबके होश उड़ जाते हैं....इस मामले में मामा बिल्कुल बेगुनाह निकलता है....वो लड़की जो अपने मामा पर अपने साथ बलात्कार करने का आरोप लगा रही थी वो एक लड़के के साथ शादी करना चाहती थी और मामा इस शादी के खिलाफ थे....इसके चलते उसने ये सारा नाटक रचा....लेकिन इसमें मीडिया की जो भूमिका रही वो कई सवाल खड़े करती है....आखिर मामा-मामी की मौत का जिम्मेदार कौन था....क्या वो मीडिया नहीं था जिसने मामा को जमाने के सामने मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा....कभी-कभी वक्त कैसे करवट लेता....कल तक जो प्रियभांशु मीडिया की इस गंदगी को पर्दे पर पेश करने की कोशिश कर रहा था....आज वही प्रियभांशु खुद गंदमी का शिकार हो रहा है....