Thursday, March 5, 2009

असीम सहिबाबादी की रचना ...एक रिक्सावाले की व्यथा


परिंदा हूँ ये फितरत है, मेरा उड़ना नही जाता ,
जमीं पर आ तो जाता हूँ मगर ठहरा नही जाता।
बियाबानो के पौधों की तरह है,ज़िन्दगी अपनी ,
हम अपने दम पे बढते हैं हमें पाला नही जाता ।
वही आटे की रोटी है ,वही आटे की चिड़िया है ,
खिलौना हमको रोने पर कभी लाया नही जाता ।
अटक जाते है , जब सूखे निवाले मेरे बच्चों के ,
मैं मुहं फेर लेता हूँ , उधर देखा नही जाता ।
अभी है पाँव कुछ छोटे नही आते है पैडल तक ,
वो रिक्शा खींचता तो है मगर खींचा नही जाता ।

Wednesday, March 4, 2009

पत्रकार को धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए?








यह लेख पुरस्कार को ध्यान में रखकर लिखा गया था । लेकिन प्रधान सर ने आज इस उम्मीद को यह कहकर टाल दिया कि कुछ ही लेख उनके पास पहुंचे है इसलिए वे इसकी धोषणा बाद में करेंगे शायद नहीं भी करें । इस लेख को आप भी पढ़े ...

इलेस्ट्रेटेड विकली के संपादक अनिल धारकर ने 19-25 दिसंबर 1992 के अंक में अपनी संपादकीय टिप्पणी में सहकर्मियों के साथ हुई बैठक का जिक्र किया है। यह बैठक 6 दिसंबर के बाबरी मस्जिद विध्वंस की छाया में हो रही थी । एक ने पूछा,‘‘आप के पास आडवाणी के इस आरोप का क्या जवाब है कि जब कश्मीर में इतने सारे मंदिर तोड़े गए तब किसी ने चूॅ तक नहीं की, दूसरी ओर एक- सिर्फ-एक मस्जिद टूटी तो पूरा देश भड़क उठा?’’ दूसरे का मत था,‘‘हम लंबे अरसे से अल्पसंख्यकों की तरफदारी करते आये हैं।’’ एक और सहकर्मी ने शिकायत की ‘‘ बांग्लादेशी शरणार्थियों को हम क्यों आने देते हैं जबकि हमारे पास अपने लिए ही पर्याप्त साधन नहीं है। क्या केवल इसलिए नहीं कि वे अल्पसंख्यक हैं?‘‘( सदर्भ-भारतीय मुसलमानः मिथक और यर्थाथ)
यह इलेस्ट्रेटेड विकली के दफ्तर की तस्वीर मात्र ही नहीं है बल्कि यह इस ओर भी इंगित करती है कि पत्रकारीय मूल्य का कितना पतन हो चुका है? पत्रकारों के इन प्रश्नों के कई मर्म हैं। जिनमें मुख्य मुद्दा यह है कि जब उच्च शिक्षित वर्ग भी चीजों को केसरिया चश्में से देखेगा तो सड़क के आदमी से यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह इन तरह की घटनाओं पर प्रतिक्रिया देते वक्त सांप्रदायिक बहाव में नहीं बहे? ऐसे में यह बहस लाजिमी है कि पत्रकार को धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए अथवा नहीं।
पत्रकारीता का इतिहास काफी पुराना है। इस काल में पत्रकारों के लिए मुश्किल दौर भी आए और स्वर्णीम युग भी। पत्रकारों से हमेशा यह अपेक्षा की जाती रही है कि वह किसी भी मसले को धार्मिक चश्में से देखने के बजाय उसे निष्पक्षता की कसौटी पर तोले। सच्ची और सही तस्वीर पेश कर वह पत्रकारीय मूल्य को जीवित रखे। कहना गलत नहीं होगा कि कई ऐसे पत्रकार रहे हैं जिन्होंने पत्रकारीय मूल्य को जाति, धर्म और क्षेत्र से ज्यादा महत्व दिया। आजादी पूर्व की पत्रकारीता हमारे सामने है। तमाम मुश्किलों के बावजूद उस दौर के पत्रकारों ने अपने उसूलों और मजहबी एकता को टूटने नहीं दिया। यह दौर मिशन प्रधान था और मकसद थी, सिर्फ आजादी। इस मिशन को हिंदू-मुस्लिम जैसी कोई भावना प्रभावित नहीं कर सकी। मुल्क के प्रति वफादारी और हमदर्दी क्या होती है, इसका अंदाजा ‘पयामे-हिंद’ अखबार के संपादकों की शहादत से समझा जा सकता है। आजादी की लौ को जलाए रखने और ब्रिटिश सरकार का विरोध करने के कारण इस अखबार के कई संपादक शहीद हुए। मौत की सजा पाए सभी संपादकों का संबंध मुस्लिम कौम से था।
यहां गणेश शंकर विधार्थी का जिक्र लाजिमी है। सन् 1931 के कानपुर दंगे के बारे में विधार्थी ने लिखा था- रक्तपात ओर नरहत्या अच्छे काम नहीं। संसार के सुन्दर और सबल आदमियों का एक-दूसरे के गले काटना कोई मनोहारी दृष्य नहीं; वह आत्मा को कोई मृदु संदेश देने वाली चीज नहीं।- हालांकि इसी सांप्रदायिकता की आग को बुझाने के क्रम में उनकी हत्या कर दी गई। बावजूद वे पूर्वाग्रह को किनारे रखकर सच्ची तस्वीर पेश करने में सफल रहे। पत्रकारीय मूल्य को आत्मसात् कर चीजों को वस्तुनिष्ठ तरीके से देखना, उनकी विशेषता रही।
यह तो रही आजादी पूर्व की दास्तां। अब तस्वीर बदली है। पत्रकारीय मूल्य में आई गिरावट ने इस मिशन प्रधान क्षेत्र को मुनाफा प्रधान में बदल दिया। विभिन्न मसलों को धार्मिक नजरीये से देखने की स्थिति ने देश और समाज को कई तरह से नुकसान पहुंचाया। 1984 ई. में हुए हिंदु-सिक्ख दंगा, भागलपुर दंगा, सीतामढ़ी दंगा, गुजरात का दंगा, बाबरी मस्जिद विध्वंस या फिर मुम्बई बम विस्फोट- कई ऐसे उदाहरण हमारे सामने हैं जिसमें खबरों को धर्म के आधार पर परखा गया। 1990 ई. में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के दौरान अफवाहों को खबर बनाकर प्रमुखता से छापा गया। इन खबरों से कई जगह दंगे भड़क उठे। आगरा से प्रकाशित ‘ आज ’ ने तो 11-23 दिसम्बर 1990 को खबर छापी कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविघालय के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल काॅलेज में भर्ती 32 मरीजों को जहरीला इंजेक्शन देकर हत्या कर दी गई है। खबर छपने के साथ ही माहौल गर्म हो उठा और कईयों को अपनी जान से हाथ घोना पड़ा। बाद में यह खबर गलत साबित हुई। ठीक इसी चरित्र जैसी खबरों को स्वतंत्र चेतना, स्वतंत्र भारत और दैनिक जागरण जैसे अखबारों ने भी छापा जो निराधार साबित हुआ। मीडिया के इस चरित्र पर जाने-माने मीडिया विषेशज्ञ सुधीश पचोरी ने लिखा है- 2007 ई. में अयोध्या में हुए शिलापूजन में मीडिया ने घंटों लाइव बिताए और देशभर में एक ‘अ-घटना’ को ‘बड़ी घटना’ बनाकर दिखाया। हम देखते हैं कि तब से मीडिया हर ऐसी हिन्दुत्ववादी घटना को इतना ज्यादा कवर करने लगा है कि गुजरात का मामूली-सा पादुका पूजन तक लाइव हो गया। इसका अर्थ यह हुआ कि मीडिया ने दर्शकों के बीच हिन्दुत्व को जमकर बेचने का काम किया। सेक्युलर विचारों को हाशिये तक पर नहीं रखा। (संदर्भ- मीडिया की परख)
क्या कारण है कि आम पत्रकार हिन्दु-मुस्लिम विवाद को निष्पक्ष नजरिये से नहीं देख पाता? जवाब आरक्षण विरोधी आंदोलन के वक्त उसकी भूमिका में देखा जा सकता है। जिस तरह अधिकतर पत्रकारों के हिन्दु रहने के कारण दलित और पिछड़ा वर्ग नहीं दिख पाया। उसी तरह हिन्दु-मुस्लिम विवाद में वे मुस्लिम पक्ष नहीं देख पाते। 9/11 के बाद अमेरिकी मीडिया पश्चिमी मीडिया की मुस्लिम विरोधी बातों ने हमारे यहां की मीडिया को भी प्रभावित किया है। पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर हम भी आतंकवाद अथवा आतंकवादी कार्रवाई को सीघे एक धर्म विशेष से जोड़ने लगते हैं। दलील यह दी जाती है कि उनके धर्मस्थलों में आतंकवादी बनने की तालीम दी जाती है। क्या यह सच है? आजादी के 60 सालों के बाद भी मुसलमान अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं-इसके पीछे कहीं-न-कहीं हमारी राजनीतिक व्यवस्था जिम्मेदार है। हम इन बातों को भूल जाते हैं और उन धर्मामवलंबी की नकारात्मक छवि अपने अवचेतन मन में बनाते हैं। ‘ मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना ’- को स्वतंत्रता दिवस पर सुनना तो अच्छा लगता है लेकिन उसके मर्म को समझकर रिपार्टिंग करना, शायद कठिन? पूर्वाग्रह से प्ररित रिपोर्ट न सिर्फ पत्रकारीय कर्म की तिलांजली देते हैं बल्कि भारतीय समाज की बुनियाद ‘ अनेकता में एकता ’ को भी कमजोर करते हैं।
मार्क्स ने कहा है कि धर्म अफीम की तरह है। निश्चित तौर पर हमारा समाज अफीम की गोली खाकर सोया है। विभिन्न परेशानियों से जुझने के बावजूद हम अपने अधिकारों के लिए शायद ही खड़े होते हैं। सोचते हैं- ‘ जाहे विधि राखत राम ताहे विधि रहिये ’। लेकिन समाज का एक जिम्मेदार व्यक्ति (पत्रकार) भी अफिम की गोद में सोकर सूचनाओं का प्रसारण करेगा तो देश और समाज को क्या दिशा मिलेगी?
दरअसल, मीडिया मुसलमानों के प्रति खास नजरिया अपनाकर न सिर्फ भारतीय समाज को नुकसान पहुंचा रहा है बल्कि अपनी विश्वसनीयता भी खोता जा रहा है। जरूरी नहीं कि सारे मीडियाकर्मी एक ही विचार के हों, लेकिन उनमें मानवीय मूल्यों की गहरी समझ तो होनी आवश्यक है। स्वतंत्र, समझदार, निष्पक्ष और आघुनिक मीडिया के लिए जरूरी है कि पत्रकार न सिर्फ धर्मनिरपेक्ष ही हो बल्कि वह पंथनिरपेक्ष और जातिनिरपेक्ष भी हो। तमाम तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर ही हम समाज को रचनात्मक प्रेरणा दे सकेंगे और पत्रकारीय दायित्व की रक्षा कर सत्य को उजागर कर सकेंगे।

उपचुनाव का झटका -मायावती हुयी "मुलायम"



उत्तर प्रदेश के भदोही विधानसभा उपचुनाव में बसपा की हार ने कई सवाल खड़ा किए है । पिछले दिनों समाजवादी पार्टी के रास्ट्रीय नेता और राज्य सभा सांसद के साथ मै दो दिन के चुनावी दौरे पर गया था। मैंने वहा सुरियावा ब्लाक के लगभग २५ गावों का दौरा किया । जिसमे कई बाते खुल कर सामने आई । इस उपचुनाव में दो लोगो की चर्चा सबसे आधिक थी - पड़ोस के सपा विधायक विजय मिश्रा जिनकी पत्नी भदोही की जिला पंचायत अद्यक्ष भी है । इनके बारे में कई तरह की चर्चाएँ थी , ये बाहुबली है और इनकी जिले में तूती बोलती है ऐसा लोगों का कहना था । विजय मिश्रा पर कई आपराधिक मुक़दमे लगे है । कुछ लोगो का कहना था कि बनारस के व्यापारी रुंगटा अपहरण में प्रयोग की गई गाड़ी इन्ही की थी । ९५ के लगभग भदोही में हुए शुक्ला वकील हत्याकांड में लिप्त राजपूत बाहुबली को जेल भिजवाने और उसपर कई मुक़दमे दायर करवाने के कारन विजय मिश्रा ब्रह्मण स्वाभिमान के प्रतीक बन गए । इस बार के उपचुनाव में सपा प्रत्याशी मधुबाला पासी को टिकट दिलवाने में विजय मिश्रा का ही योगदान था ।
वही दूसरी ओर बसपा का मोर्चा पड़ोस के विधायक और प्रदेश सरकार में मंत्री रंगनाथ मिश्रा ने संभाला था । रंगनाथ मिश्रा पहले बीजेपी के कद्दावर नेता थे लेकिन बीजेपी के पतन के कारण उन्होंने बसपा को नया घर बनाया। रंगनाथ मिश्रा के बारे में लोगो ने बताया की पहले बहुत सहयोगात्मक थे , लोगो के सुख दुःख में सामिल होते थे , कार्यकर्ताओं सहित जनता के लिए उत्तरदायी थे । लेकिन मायावती सरकार में हर महीने रूपया देने के कारण वसूली में सलिप्त होगये है । जिससे क्षेत्र में नकारात्मक प्रभाव पड़ा है । कोटेदारों , ठेकेदारों , प्रधान आदि लोगों पर उपचुनाव में बसपा को जिताने के लिए दबाव बनाने के कारण रही सही प्रतिष्ठा भी खो दी । मंत्री बनने के बाद पहली बार भदोही के दौरे पर रंगनाथ मिश्रा ने १६ घंटे बिजली देने की बात कही थी , इसमे वो पूरी तरह विफल रहे । जनता में रोष का एक कारण ये भी था । यहाँ के लोगो ने बताया की मिर्जापुर से पत्थरों को काट कर लखनऊ में पार्क और मूर्तियाँ बनवाई जा रही है , जबकि कालीन उद्योग के पतन से बेहाल लोगो की सरकार कोई खोज ख़बर नही ले रही है । बसपा के स्थानीय सांसद भी क्षेत्र को लेकर बेहद उदासीन रवैया अपना रहे है ।
नसीमुदीन सिद्दीकी चुनाव के १० दिन पहले ही बनारस सिर्किट हाउस में डेरा जमाये थे । मुस्लिम बाहुल्य भदोही में लगातार दौरा कर रहे थे लेकिन बीएसपी को अपेक्षित परिणाम दिलाने में विफल रहे । मायावती के भदोही चुनावी जनसभा में मंच सहित सभी जगहों पर बसपा के घोषित प्रत्याशी सूर्य मणि ही छायें रहे । लोगो का कहना था की यह विधान सभा के प्रत्याशी का चुनाव है या लोकसभा के । सूर्यमणि क्षेत्र के ही नही वरन अन्तर रास्ट्रीय स्तर के कालीन व्यापारी है । अरबपति व्यापारी को टिकट मिलने से बसपा के ही नही वरन आम लोग भी नाराज है । उनका कहना है की क्या बसपा में नेताओं का आकाल पड़ गया है ? अथवा जिसके पास रूपया नही है वो बसपा का टिकेट नही पा सकता? जिले से सटे दो अन्य ब्रह्मण नेताओ काबीना मंत्री राकेशधर त्रिपाठी और नकुल दुबे को मायावती के बार बार अपमानित करने की उड़ती ख़बर से ब्रह्मण मतदाता नाराज़ था । जिले के कुछ प्रमुख ब्रह्मण नेता जो इस समय बसपा में है , उनका कहना था की दरी पर दलितों के साथ बैठना और मायावती का पैर छूना ब्राह्मणों का अपमान है , सतीश चंद्र मिश्रा के बारे में पूछने पर जाति विशेष के लोगो का आक्रोश खुल कर सामने आ गया, लोगो ने बताया कि उनके परिवार और रिश्तेदार के २५ लोग लाल बत्ती का लुफ्त उठा रहे है ।
चुनाव प्रचार के दौरान सपा के प्रदेश अध्यक्ष और मुलायम सिंह के छोटे भाई शिवपाल यादव और विजय मिश्रा कि तलाशी लेना और सभा न करने से जनता कि सहानभूति भी सपा के पाले में गई । कुल मिलकर आपसी समस्यायों से जूझ रही सपा के लिए यह उपचुनाव वरदान साबित हुआ । मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में जीत मुस्लिम मतों का विश्वास सपा में होने कि पुष्टि करता है । सपा की विजय में पार्टी की रणनीति का बड़ा योगदान रहा । मुस्लिम जिला अद्यक्ष , ब्रह्मण रणनीतिकार विजय मिश्रा सहित पार्टी के सभी रास्ट्रीय नेताओ के दौरे से सपा ने विजय श्री हासिल की । बसपा के लिए यह चुनाव खतरे की घंटी का काम कर गया । बलिया के संसदीय उपचुनाव में हार के बाद यह बसपा की दूसरी हार है । दलितों की उपेक्षा , पार्को और प्रतिमाओं पर थोक के भावः धन खर्चा करने की प्रवित्ति , बाहुबलियों को टिकट वितरण कर पार्टी कार्यकर्ताओं को नज़र अंदाज़ करने जैसे कई कारन मायावती और उनके रणनीति कारों को मंथन करने के लिए विवश करते है ।

Tuesday, March 3, 2009

गुजरात के सीधी गोमा



आज जब दुनिया में पशु-पक्षियों की संख्या दिन-ब-दिन घटती जा रही हो।उनके अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा हो गया हो,ऐसे में सिधी गोमा जनजाति के लोगों की पशु-पक्षियों से लगाव उमींद की किरण जगाती है। जी हां। सिधी गोमा जनजाति के लोगों का नृत्य में वो प्रेम दिखता है।मोर की तरह नाचते है, शेर के जैसे दहाड़ते है।तोता,हिरन, हाथी का अभिनय कर लोगों का दिल जीत लिया।सुरजकुंड मेले में गुजरात से आये कलाकार,जिन्हें सिधी गोमा जनजाति के नाम से जाने जाते हैं। ये मूलतः दक्षिण अफ्रीकी है। जो 8वीं षताब्दी में भारत आये और गुजरात के तटिय भाग पर बस गए। साथ में लयबद्ध गीत संगीत अपनी विरासत में लेकर आए। जिस ड्रम को बजाकर नाचते है उसे जक़ीर बोलते हैं। इनके साजो समान को ब्राजिलियन में बेरीम्बा बोलते है । इसे कलात्मक ढंग से बजाते हुए ये गहरे आनंद में उतरते है। ये इनकी अराधना भी है। धीरे-धीरे संगीत मस्ती के रंग भरता है तो समूह के प्रत्येक व्यक्ति जानवरों का अभिनय कर नृत्य करते है। नृत्य के क्रम ये नारियल भी तोड़ते है। इस गीत को बैठीं ढमाल कहते है। इनका नृत्य संगीत ही ईष्वर की अराधना है। जिसमें स्त्री पुरुष मिलाकर बारह की संख्या में ये कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं।इन्हें मेले के प्रशासन की ओर से एक दिन का 250 रुपये मिलते है। अपने नृत्य संगीत का जादू इन्होनें विदेषो में भी बिखेरा है। सिधी गोमा नृत्य का पहली बार विडियो 2004 में रिलीज किया गया था।ऐसा नहीं है कि ये पूरे वर्ष ये सिर्फ घूम-घूमकर नाच गाने ही करते है। सभी लोग कुछ न कुछ अवश्य करते है।कारपेंटर, दर्जी,किसान,मछली पकड़ना इनका मुख्य व्यवसाय है।


गन्ने की किल्लत

पूर्वी उत्तर प्रदेश की ज्यादातर चीनी मीलें गन्ने की कमी की वज़ह से समय से पहले ही बंद हो गयी है। आमतौर पर जून के पहले सप्ताह तक गन्ने की पेराई करने वाली मीलों के पास गन्ने का अभाव है। कहा यह जा रहा है कि गन्ने की कालाबजारी हो रही है।
गन्ना खेत से ही बिक जा रहा है। उ.प्र. सरकार ने गन्ना का न्यूनतम सर्मथन मूल्य 140 रुपए घोषित कर रखा है। वहीं बजाज ग्रुप ने गन्ना विकास के नाम पर 15 रुपए अधिक देकर गन्ने खरीद रहा है। इसके बावजूद उसकी मींले बड़े मुश्किल 8 से 10 घंटे ही चल पा रही हैं। गन्ने की कमी का हाल यह है कि बिच्चैलिया खेत में ही किसानों को मनमाफ़िक पैसा देकर गन्ना खरीद रहें हैं। क्रेसर मालिक भी 160 से 170 रुपए देकर गन्ना खरीद रहें है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में 14 चीनी मीलें हुआ करती थी। सरकार की गलत नीतियों के कारण मुश्किल से वहां दो मीलें ही बच हुई हैं। देवरिया में गन्ने का उत्पादन 600 लाख टन हुआ करता था जो घटकर लगभग 400 लाख टन पर आ गया हैं। वहीं महाराजगंज जिले में गन्ने का क्षेत्रफल घटकर 66 फीसदी हो गया है। मौजूदा समय में यदि किसान चीनी मीलों को गन्ने नहीं बेच रहें है। तो उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि किसानों का सही समय से भुगतान न होना। प्रदेश में चीनी निगम की 22,निजी क्षेत्र की 83, सहकारी चीनी मील संघ की 28 मीलों पर किसानों का 16 हजार करोड़ रुपए बकाया है। हाई कोर्ट से फटकार पे फटकार पाने के बावजूद गन्ना मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी झूठे आश्वासन देने से बाज नहीं आ रहे है। बहुत सारे किसानों के हालात बद से बदत्तर हो गयी हैं। वे अपने खेत गिरव़ी रखने या बेचने के लिए मजबूर है। क्योंकि उन्होंने ऋण लेकर खेत में निवेश किया था। दूसरी वज़ह यह है कि प्रदेश में पहली बार ऐसा हुआ है कि धान और गेहूं का समर्थन मूल्य गन्ने के समर्थन मूल्य से ज्यादा होने के चलते किसानों का गन्ने से मोहभंग हो गया है। धान और गेहूं की ओर वे अधिक आकर्षित हो रहे हैं । आज किसानों की समस्याएं चुनावी मुद्दा नहीं होती बल्कि इनका स्थान जाति,धर्म, और क्षेत्र ने ले लिया है। जो देश के विकास में बाधक है।

Monday, March 2, 2009

समाज और सेक्स


रात के लगभग दस बजे का वक्त। डिफेंस कालोनी, नई दिल्ली में चौकीदार रूटीन चैकिंग के लिए दो बाइक सवारों को रोकता है
बाइक सवार, "भाई, रोज़ ही तो यहाँ से जाते हैं। अभी भी नहीं पहचानते हो क्या ?"
चौकीदार, "ये सब तो करना ही पड़ता है।"
उसी समय दो लड़कियां वहाँ से गुज़रती हैं।
चौकीदार, "देखो साहब, समाजसेवा हो रही है।"
बाइक सवार, "समाजसेवा?"
चौकीदार, "और नहीं तो क्या साहब! अगर ये लोग न हों तो रोज़ कितने रेप होने लगेंगे।"
चौकीदार के शब्द देर तक कानों में गूंजते रहे। ये थोड़ी सी बातचीत ज़्यादा सोचने पर मजबूर करती है। इन्सान क्यों सेक्स के मामले में इतना वीभत्स हो जाता है ?
दरअसल किसी भी समाज की वास्तविक हालत का अनुमान उस समाज में मौजूद नियम, कानूनों या मान्यताओं से भी लगाया जाता है। जिस समाज में जितने ज़्यादा प्रतिबंधकारी तत्व होते हैं, वह समाज उतना ही अशिक्षित और पिछड़ा माना जाता है। नियम, कानूनों और मान्यताओं की प्रवृत्ति किसी काम को करने से रोकने की होती है, जबकि इंसानी प्रवृत्ति इन्हीं प्रतिबंधित कामों को करके देखने की। हमारे समाज में सेक्स को लगभग अछूत विषय माना जाता रहा है। इस पर घर, स्कूल या समाज में खुली बातचीत नहीं होती है। इसी छुपाने और ज़बरन देखने की खींचतान और अधकचरी जानकारियों के परिणाम हमारे समाज में आसानी से देखे जा सकते हैं।
इसी तरह हमारे बीच में शादी से पहले सेक्स को ग़लत माना जाता रहा है। अगर हमारे समाज में कोई आदमी शादी नहीं करता है या किसी की शादी किन्हीं वजहों से देर तक नहीं हो पाती तो वह सेक्स का अधिकारी नहीं माना जाता। इतनी उम्र तक सेक्स न करने से इन्सान का मानसिक रोगी हो जाना स्वाभाविक है। इन्सान की और बुनियादी आवश्यकताओं की तरह सेक्स भी है और सिर्फ़ शादी ही इस काम को करने का सामाजिक प्रमाण-पत्र।
सेक्स वर्कर्स और उनके काम को हमारे समाज में ग़लत माना जाता है। नैतिकता की दुहाई दी जाती है। मामला सिर्फ़ नैतिकता का न होकर नैतिकता के तय कर दिए मायनों का भी है। अक्सर उनके काम को उनकी मज़बूरी से भी जोड़ कर देखा जाता रहा है। इस काम को कानूनी मान्यता दिलाने की भी बातें होती रहती है। यहाँ भी बात सिर्फ़ कानूनी मान्यता तक सिमटी न होकर काफी गहरी है। किसी भी काम को समाज में मान्यता सिर्फ़ कानूनी तरीकों से नहीं दिलाई जा सकती। सामाजिक चेतना भी इसमें अहम् भूमिका निभाती है और सामाजिक चेतना या सही समझ बनने के लिए इससे जुड़े सभी मसलों पर खुलकर बहस होना जरुरी है और यह बहस शुरुआती स्तर से ही होनी चाहिए।

सुखराम: शर्ट रूप सुक्रम

सोमवार की सुबह पुस्तकालय में किताबों के बीच मुझे नागार्जुन रचनावली दिखी। इसके भाग-2 के पन्नों को पलटते वक्त मेरी नजर एक कविता पर टिक गई। यह कविता पी।वी. नरसिंहराव सरकार में केन्द्रीय संचार मंत्री रहे सुखराम पर लिखी गई है। 1996 ई. में लिखी गई इस कविता में सुखराम के बहाने सत्ता पर किए गए कटाक्ष को आप भी महसूस करें -


सुखराम: शर्ट रूप सुक्रम


अब तक कहां छिप थे
ये ‘भारत-रत्न’
हिमाचल में पैदा हुए...
पले-पुसे बड़े हुए
पी.वी. की गोद में
बैठे, 5 वर्ष तक मौज किया
संचार मंत्री रहे
पी.वी. ने प्यार से
पीठ सहलाई
अपने आप
जादुई तरीके से
नगदा-नगदी करोड़ों की रकम
लाॅकर में संचित
होती रही
3 करोड़ से ऊपर हो गई
परिवार की महिलाओं और
बाल-बच्चों के आभूषण...
हीरा-मोती-पन्ना-पुखराज
जड़ित गहने
और न जाने क्या-क्या
हिमाचल से बाहर, सुदूर
हैदराबाद(आंध्र) के बैंक के
अंदर लाॅकर से निकले हैं...


जय हो सुखराम की !
जय हो पी.वी. के
अंतरंग सखा की !!
मगर, दरअसल
‘सुखराम’ कोई एक
व्यक्ति नहीं गोत्र है-
पूरा का पूरा- पी.वी.
नरसिंह राव इस
गोत्र के बीज पुरुष हैं
राव अगर 5 वर्ष और
प्रधानमंत्री रह पाते तो
पट्ठा सुखराम
जाने क्या हो जाता !


सुखराम- शार्ट रूप
‘सुक्रम’ तब हो जाता
त्रिभुवनव्यापी-
‘इंटरकांटिनेंटल’
विश्व का महानगर
कोई शायद ही छूट पाता
सुक्रम की पचास -
पचपन मंजिली इमारतों से !
इयरबुक भर जाते
सुक्रम से ...