Sunday, May 3, 2009
कैसा और किसका चुनाव?
देश के सभी १८ साल से ऊपर के लोगों का नाम वोटर लिस्ट में नहीं होता। इस पर लगभग आधे लोगों का मत देकर किसी को नेता चुनना और उसका १०- २० फीसदी वोट लेकर संसद में जाना ये हमारे लोकतंत्र की हकीकत है। पिछले साल के आख़िर में हुए मुंबई हमले के ख़िलाफ़ सपनों की नगरी के लोगों का गुस्सा देखकर लगा शायद इस बार मुंबई वासी नींद से जग जायें। लेकिन इस बार पिछले साल(४५ फीसदी) से भी कम- ४४ फीसदी मतदान कर मुंबई ने बता दिया है कि उसकी नींद अभी खुली नही है। इस नींद को तोड़ने की कोशिश फ़िल्म जगत के सितारों ने भी की। जिन्हें देखकर पूरा देश कपड़े पहनता हो, बाल कटाता हो या उन्हीं की तरह जीने की कोशिश करता हो, जनता ने उनकी बात भी नहीं मानी। वैसे इन सितारों में से आधे ख़ुद वोट देते नज़र नहीं आए।
चुनावों में मत नहीं देने का मतलब या तो चुनावों का विरोध हो सकता है या फ़िर गहन उदासीनता। चुनावों का विरोध किसी न किसी वजह से किया जाता है। लेकिन इस तरह की उदासीनता ज़्यादा ख़तरनाक है, जब आप बिना बात किए कैकई की तरह कोपभवन में मुंह फुला कर बैठ जायें! देश के नेतृत्व को इस बात को समझना होगा कि क्यों जनता लगातार चुनावों से मुंह मोड़कर खड़ी है?
Tuesday, April 28, 2009
क्योंकि चुनाव एक क्रिकेट मैच नहीं है...
रही बात अंतर की तो चुनावों में आपको क्रिकेट मैच की तरह दूसरा मौका नहीं मिलता. पहला ही मैच फाइनल मैच होता है. हाँ इसके लिए आपको पॉँच साल तक तैयारी का मौका ज़रूर मिलता है. इसके अलावा चुनावों से पहले क्रिकेट मैच के उलट आपको जनता को अपनी नीतियाँ बतानी होती हैं, जिसके आधार पर जनता आपको वोट देती है जबकि क्रिकेट के मैच में आप मैच से पहले अपनी नीतियाँ किसी को नहीं बता सकते. हाँ कप्तान(प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार) तय कर देने से जनता का ध्यान आपकी नीतियों की तरफ और टीम के बाकी कमज़ोर खिलाड़ियों पर नहीं जाता.
व्यक्ति-पूजन से ग्रस्त इस देश की जनता की नस को हमारे नेताओं ने क्या खूब पकडा है! प्रधानमंत्री पद का एक उम्मीदवार तय कर दो और उसके नाम पर वोट मांगने जाओ. नीतियों का क्या है, जनता तो विचारधारा की अनुयायी न होकर व्यक्ति विशेष की है.
व्यवस्था तो यह की गयी थी कि राष्ट्रपति संसद में बहुमत प्राप्त दल के नेता को प्रधानमंत्री चुनेगा और सरकार गठन का निमंत्रण देगा लेकिन माज़रा बदल चुका है. सभी दलों, गठबन्धनों के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पहले ही तय हो जाते हैं. वर्तमान चुनावों की छोडिये अगले चुनावों के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार(कांग्रेस-राहुल गाँधी) भी निर्धारित होते हैं. और हालात यह हैं कि कांग्रेस के इस 'उम्मीदवार' को अगर दिल्ली से भी टिकट दिया जाये तो हारने की उम्मीद नज़र नहीं आती है. जनता उसे प्रधानमंत्री बनाने को तैयार है. हालाँकि उसका अनुभव किसी राज्य की बागडोर सँभालने का तो दूर रहा एक मंत्री पद का भी नहीं है.
जनता उसमें उसके पिता की छवि जो देखती है. माना जाता है कि नेतृत्व के गुण तो उसे 'विरासत' में मिले हैं. जनता को अभी इन सब चीजों से ऊपर उठकर वोट देना सीखना है. किसी दल के लिए हो या न हो देश की जनता के लिए 'दिल्ली अभी दूर है.'
Friday, April 24, 2009
जूता बनाम लोकतंत्र
इन दिनों नेताओं और जूतों में एक रिश्ता सा बनता जा रहा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बुश पर जूते क्या चले नेताओं को जूते मारने का चलन सा चल पड़ा। चीनी नेता बेन जियाबाओ, गृहमंत्री पी।चिदंबरम,विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवाणी, यहां तक कि अब अभिनेता जीतेन्द्र भी इस जूते चप्पल के खेल से बच नहीं सके। हालात इतने खराब हो गए हैं कि जूते-चप्पलों से बचने के लिए अब नेताओं को नई व्यवस्था करनी पड़ रही है। जिसकी झलक दिखी अहमदाबाद के नरोडा में, जहां भाजपा के स्टार प्रचारक और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जनता से मुखातिब होने वाले थे। किसी कोने से जूते न उछले इसलिए मंच के आगे भाग को जाल से घेर दिया गया था। अभी तक नरेन्द्र मोदी की तरफ जूते या चप्पल नहीं उछले हैं। लेकिन कहते हैं ना कि दुर्घटना से सुरक्षा भली है-इसलिए यह पूरी कवायद की गई।
खैर, मुद्दा यहां यह नही है कि नेताजी जूते खाने लायक हैं या नहीं। बल्कि हमें यह सोचना चाहिए कि इन घटनाओं से हमारे लोकतंत्र की जीवंतता पर कितना असर पड़ सकता है। ऐसी घटनाओं में हम उस व्यक्ति पर जूते चला रहे होते हैं जिसे हम खुद चुनकर संसद में पहुंचाते हैं। जिसे हम निर्णय लेने वाले हाथ भी कहते हैं। यानि हम अपने ही चुने हुए प्रतिनिधियों का ही जूतों से स्वागत करते हैं। कहा गया है कि कोई घटना अगर पहली बार हो तो इतिहास बनता है, दो-तीन बार हो तो उसे त्रासदी कहते हैं लेकिन अगर वही घटना बार-बार हो तो वह उपहास का पात्र होता है। कुछ ऐसा ही भारत में भी दिख रहा है। जहां जूता मारना अब सियासी खेल बन चुका है। खबर तो यह भी है कि कानपुर के एक गांव में तो जूते मारने की बकायदा स्कूल खोली गई है। जहां बच्चे और बुजुर्ग नेता के एक पुतले पर जूते-चप्पल मारने का अभ्यास कर रहे हैं। हम यह लगभग भूल चुके हैं कि मुंतजर अल जैदी का विरोध तो एक ऐसे ‘तानाशाह’ के खिलाफ था जिसने इराक को अधोषित उपनिवेश बना रखा है।
इसमें दो राय नहीं कि नेताओं ने देश का बंटाधार किया है। लेकिन इसके लिए मात्र नेता ही दोषी नहीं हैं। कसूर अपने को अच्छे कहने वाले लोगों का भी है,जो राजनीति को गंदा खेल समझते हैं। नेताओं को जूते मारना ही सारी समस्याओं का समाधान नहीं है। हमारे पास वोट का भी तो अधिकार है जिसका बेहतर प्रयोग कर हम देश का भला कर सकते हैं। हलांकि ज्यादातर मतदाताओं की यह शिकायत रहती है कि उनके इलाके में कोई ईमानदार उम्मीदवार मैदान में नहीं है। लेकिन हम ईमानदार उम्मीदवार को भी संसद में कहाँ पहुंचाते हैं? नेताओं को जूते मारने से बेहतर है कि हम चुने हुए प्रतिनिधि को ‘वापस बुलाने के अधिकार’ के लिए लड़े। अभी भी जनांदोलन कितना कारगर है इसका बेहतर उदाहरण सूचना का अधिकार आंदोलन से समझा जा सकता है।
कोई भी काम सही रणनीति बनाकर की जाए तभी उसका परिणाम अच्छा होता है। गलत तत्वों वाले नेताओं से मुक्ति पाने के लिए भी हमें उचित तरीका ही अपनाना होगा। महज मीडिया में आने के लिए जूते चलाना उचित नहीं। जूते चलाकर हम मात्र विरोध के इस बढ़िया औजार का उपहास उड़ा रहे हैं। अभी जरुरत है बेहतर रणनीति बनाकर जनांदोलन को आगे बढ़ाया जाए।
Tuesday, April 7, 2009
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे जूते में है...
ठीक पिछली बार की तरह ज़्यादातर पत्रकारों ने जरनैल सिंह के इस काम को ग़लत ठहराया है. खुद जरनैल का भी मानना है कि उसने ग़लत तरीका अपनाया. ठीक भी है, किसी पत्रकार से ऐसे आचरण की उम्मीद नहीं की जा सकती. जैसे अक्सर खिलाडी के बारे में कहा जाता है कि उसे मर्यादित व्यवहार करना चाहिए. अगर यही हाल रहा तो नेताओं की प्रेस-कांफ्रेंस होनी बंद हो जाएँगी या फिर पत्रकारों को उसमें नंगे पैर जाना होगा. जूता पड़ना किसी भी आदमी की गरिमा के खिलाफ है. कैसे और कब से है कोई नहीं जानता, बस है, इतना जानते हैं.
वैसे जरनैल सिंह की जगह किसी आदमी ने यह काम किया होता तो मामला शायद ठीक रहता(वैसे यह एक आदमी की ही प्रतिक्रिया थी). आदमी इसीलिए कि खुद जरनैल सिंह ने अपने को दो ही श्रेणियों में गिना है-१. पत्रकार (जूता फेंकते वक़्त), २. सिख (गुरूद्वारे जाते वक़्त). जूता घटनाक्रम के पीछे चुनावों का भी बहुत बड़ा हाथ है. अगर चुनाव न होते तो न कांग्रेस जल्दबाजी में जगदीश टाईटलर को क्लीन-चिट दिलवाती और न जूते खाने की नौबत आती. हाँ चुनावों की वजह से ही जरनैल सिंह को छोड़ दिया गया. वरना देश के गृहमंत्री पर जूता फेंकने वाले को 'आम माफ़ी'!
अगर विचार किया जाये तो जूता फेंकने के दो कारण बनते दिखते हैं- १. तात्कालिक कारण, २. दीर्घकालिक कारण. पी. चिदंबरम जिस बेशर्मी से कांग्रेस का बचाव कर रहे थे, निंदनीय है. देश की राजनीति की थोडी भी जानकारी रखने वाला शख्स जनता है कि सी.बी.आई. किसके इशारों पर काम करती है! और चिदंबरम के जवाब पत्रकारों के लिए थे. चिदंबरम ने जरनैल को सिखों के कत्ले-आम और जगदीश टाईटलर को सी.बी.आई.की क्लीन-चिट और इस सबमें कांग्रेस की भूमिका के बारे में प्रश्न पूछने से रोका था. इस बात ने भी जरनैल को गुस्सा दिलाया. लेकिन वह पहले से ही जूता खोल कर बैठे थे, शायद घर से ही पक्के इरादे से चले थे.
दूसरा कारण थोडा लम्बा है. कांग्रेस आये दिन खुद को सेक्यूलर पार्टी कहती रहती है. अल्पसंख्यकों के वोट बटोरने की कोई भी कोशिश नहीं छोड़ती. गिना-गिना कर बताती है कि उसने ही एक सिख को प्रधानमंत्री 'बनाया'.अगर कांग्रेस सन् १९८४ में हुए सिखों के कत्ले-आम को लेकर इतनी ही गंभीर है तो बताये कि ३००० से ज्यादा सिखों को मारने-मरवाने वालों के खिलाफ उसने क्या किया? छः कमिटियाँ गठित की, मंत्री-पद से कुछ त्यागपत्र दिलवाए, कुछ प्यादों को सजा दिलवाई? और आखिरकार असली मोहरों को लगभग क्लीन-चिट दिलवा कर चुनाव भी लड़वा रही है. एक 'धर्मनिरपेक्ष' देश में कोई अल्पसंख्यक इतना मजबूर हो जाये कि उसे अंजाम की परवाह किये बिना ऐसा कदम उठाना पड़े! यह बहुसंख्यक वर्ग के समझ से बाहर की बात है. और खुद को धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाली कांग्रेस के लिए एक सबक. अगर कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष होने का ढोंग थोड़े दिन और चलाना चाहती है तो जगदीश टाईटलर को टिकट नहीं देगी.
Saturday, April 4, 2009
हंगामा क्यों है बरपा?
तीसरे मोर्चे को लेकर देश भर की राजनीति में शुरू से ही सुगबुगाहट रही है. हालाँकि राजग और यूपीए शुरू से ही नकारते आ रहे हैं कि तीसरा मोर्चा सत्ता में आ सकता है. दोनों गठबंधन अक्सर तीसरे मोर्चे से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार को लेकर चुटकी लेते रहे हैं. संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री लोकसभा का नेता होता है जो बहुमत प्राप्त दल का सर्वमान्य नेता होता है. अतः तीसरे मोर्चे के नेता(प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार) का चुनाव के बाद चयन करने का भी कांग्रेस और भाजपा मजाक उडाते रहे हैं. अगर आडवाणी की बात सही है और कांग्रेस और भाजपा को इस पर भरोसा भी है तो तीसरे मोर्चे को लेकर वो इतने चिंतित क्यों दिखाई दे रहे हैं?
भारत जैसे बहुसंस्कृतीय देश में ये असंभव है कि दो राजनीतिक पार्टियाँ पूरे देश की जनता का प्रतिनिधित्व लेकर सामने आ पाएं. दोनों पार्टियाँ अपनी तानाशाही देश भर में चलाना चाहती हैं और इसक लिए माहौल तैयार कर रही हैं. अगर वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी की बात पर भरोसा किया जाये तो कांग्रेस और भाजपा सांपनाथ और नागनाथ हैं और इन्हें ये नाम देश की जनता ने ही दिए हैं. दोनों ज़हरीली पार्टियों का शासन हम देख चुके हैं, दोनों कि ज्यादातर नीतियाँ आपस में मेल खाती हैं.
इसी बहाने ये बहस भी जन्म ले रही है कि भारत में बहुदलीय व्यवस्था होने से शासन- प्रशसन में वाकई दिक्कत तो नहीं होती है ? इस विषय पर संवाद में बहस होनी चाहिए कि देश में दो-तीन दलीय व्यवस्था हो या बहुदलीय!
Wednesday, April 1, 2009
हे, भारत भाग्य विधाता
इन सब नामों को चुनावों में शिरकत करते देखकर साफ हो जाता है कि हमारी राजनीति किस ओर जा रही है? इनमें से कुछ अपनी दुकानदारी फीकी पड़ने के बाद राजनीति में आए तो कुछ अपने काले कारनामों को छुपाने(बेहतरी से चलाने) के लिए सत्ता में आने की जुगत लगाते रहते हैं. कुछ अपने माँ-बाप की वजह से आते हैं. राजनीति का इन लोगों का अड्डा बनने की वजह से भी जनता की चुनावों में दिलचस्पी कम होती जा रही है. सवाल ये भी है कि क्या ज़मीन से आने वाले लोगों के लिए अब यहाँ जगह नहीं बची है? राजनीति में आने के लिए पैसा होना, नाम (बदनाम) होना या किसी राजनीतिज्ञ के घर में पैदा होना ही पहली शर्त है. विचारधारा का क्या है वह तो बनती बिगड़ती रहती है. इन सब नामों से क्या उम्मीद की जा सकती है?