Tuesday, January 26, 2010

मूल्यविहीन होती शिक्षा प्रणाली

हाल के दिनों में शिक्षा को लेकर हर तरफ काफी हो-हल्ला मचाया जा रहा है, शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों की सलाह पर अमल करने की बात कही जा रही है। ऐसा प्रतित हो रहा है मानो अचानक से कोई संजीवनी हाथ लग गई हो! भारत में जिस शिक्षा प्रणाली को प्रसारित और प्रचलित किया जा रहा है उसके कई पक्षों में सुधार करने की आवश्यकता है। मसलन हमारी पूरी शिक्षा प्रणाली और उसकी व्यवस्था में इतनी खामियाँ व्याप्त हैं कि उसे दूर किए बगैर किसी नए सुधार की बात करना ठीक उसी तरह होगा जैसे किसी एक मर्ज का इलाज किए बगैर नए मर्ज की दवा ढ़ूँढ़ने में लग जाना। आज हमारे नीति-निर्धारक शिक्षा व्यवस्था में जिस सुधार की बातें करते नहीं अघाते हैं उसमें व्यवसायिकता इतनी हावी होती जा रही है कि भेदभाव, महिला हिंसा, स्वास्थ्य, सुरक्षा जैसे समाज के गंभीर मुद्दों पर बात करने का समय ही नहीं है। यह सभी बातें जैसे दोयम दर्जे की बनकर रह गई हैं। नतीजतन बच्चों को घरों में माता-पिता से समय के अभाव के कारण बात करने का मौका नहीं रहता और स्कूलों में पढ़ाई का बोझ किसी को भी इस ओर सोचने की फुर्सत ही नहीं देता। भारी-भरकम सिलेबस का दबाव, परीक्षा, अंकों और डिवीजन की चूहा-दौड़ में चाहे-अनचाहे व्यक्तित्व के विकास की बहुत सी समस्याएं अनसुलझी रह जाती हैं। यह दबाव निराशा, भावनात्मक कमजोरियों, अपराधों के रूप में फूटता है जिसकी वजह से बच्चों में नशाखोरी, आत्महत्या जैसे अपराधिक प्रवृत्तियां बढ़ती जा रही हैं। समस्या सिर्फ सिलेबस की ही नहीं है, यह तो समस्या का सिर्फ एक पहलू है। प्राथमिक और उच्च शिक्षा दोनों की हालत आज खस्ताहाल बनी हुई है। प्राथमिक शिक्षा का तो यह आलम है कि शिक्षकों की जगह ऐसे अप्रशिक्षित लोगों के हाथों में बच्चों के भविष्य को संवारने की जिम्मेवारी दी जा रही है जो न तो मानक योग्यता रखते हैं और न शिक्षण कार्य में उनकी रुचि या प्रतिबद्धता है । शिक्षक जिसे कभी गुरु कह कर सर्वोच्च पदवी दी जाती थी अब वह कहीं पर शिक्षा-मित्र तो कहीं कांट्रेक्ट-टीचर के उप नामों से जाना जाता है । एक तरफ तो प्राथमिक शिक्षा का धड़ल्ले से निजीकरन कर बड़े शहरों में स्कूलों को आलीशान होटलों की तर्ज पर ढ़ाला जा रहा है जहाँ पढ़ाई से ज्यादा विलासिता पर खर्च किया जाता है। दूसरी तरफ गांवो, छोटे-शहरों और कस्बों के सरकारी स्कूलों की शिक्षा पर निर्भर बच्चों को जमीन पर बैठने के लिए दरी तक नसीब नहीं होती। बात सिर्फ प्राथमिक शिक्षा की बदहाली की नहीं है, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में तो विषमता की खाई और गहरी हो चुकी है। हमारे पास तथाकथित ‘गर्व’ करने के लिए आई।आई.टी और एम्स जैसे संस्थान तो हैं मगर इनकी संख्या ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ के समान है। हमारे यहाँ बंगलुरू जैसे शहरों में हर गली-नुक्कड़ पर थोक के भाव में इंजीनियरिंग कॉलेज खुल चुके हैं जहाँ के पढ़ाई के स्तर की सिर्फ कल्पना हीं की जा सकती है। आर्थिक उदारवाद के इस दौर में आज देशभर में शिक्षा की दुकानें खुल गई हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों की नीतियां सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को तिरष्कृत कर निजी स्कूलों और शिक्षण संस्थानों को बढ़ावा देने वाली हैं । निजी स्कूलों को दिए जा रहे बढावों और महिमा-मंडन से शिक्षा आम आदमी की पहुँच से दूर होती जा रही है। सरकार गुणवत्ता बढ़ाने के नाम पर निजी शिक्षण-संस्थानों को बढ़ावा तो देती है लेकिन सरकारी संस्थानों को उनकी जीर्ण-शिर्ण अवस्था में हीं रेंगते रहने देती है। हमारी विश्वविख्यात नालंदा और तक्षशिला की परंपरागत शैक्षिक प्रणाली धवस्त होती जा रही है और आगे की पीढियों को सिर्फ पेशेवर कर्मी बनाने की बात की जा रही है ना कि जिम्मेवार नागरिक।

शशि




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